दौड़ - ममता कालिया
Daud - Hindi book by - Mamta Kaliya
अंक - 1 दृश्य - 1 & 2
ममता कालिया के उपन्यास 'दौड़' में आधुनिक भारतीय समाज तथा भारतीय समाज एवं जीवन में व्यवसाय जगत् के प्रभाव तथा बढ़ते दबाव को दर्शाती कथा है कि किस तरह बाजार का आकर्षण व्यक्तिगत जीवन में, पारिवारिक संबंधों में, सामाजिक व्यवस्था में घुसपैठ कर रहा है ! संबंधों में भावनाओं का स्थान धीरे - धीरे काम होता जा रहा है और धन महत्व बढ़ता जा रहा है माता - पिता ने अपने जीवन में काट - कसर करके, अपनी आवश्यकताओं को प्राथमिकता न देकर, पूरी ताकत बच्चों को अच्छा जीवन देने वाले माता - पिता अंत में अकेले हो जाते हैं साथ ही बच्चों की कर्तव्य विमूढ़ता का दुख झेलना पड़ता है| पवन पाण्डे, सघन, राकेश, रेखा, स्टेला जैसे लोग आज व्यवसाय जगत् की परिस्थितियों में घिरकर हालातों के आगे मजबूर लगते हैं| सभी यह जानते है कि इस तेज़ दौड़ती ज़िन्दगी में किसी एक जगह बैठे रहकर अपना कैरियर और लाइफ़् सेटल करना सम्भव नहीं है इसीलिए भी इन चीज़ों के लिए मानवीय सम्बन्धों में जिस तेजी से बदलाव आया है , रिश्तों से अधिक महत्त्व कैरियर हो गया है इससे यही साबित होता है कि आज के आधुनिक जीवन में वास्तव में कैरियर और ऐशो-आराम की ज़िन्दगी ही सब कुछ है नई पीढ़ी के लिए बाकी सबकुछ महत्वपूर्ण नहीं है। उपन्यास में पवन के सामंतशाही सोच और अपने माँ-बाप के साथ किए गए महाजनी बर्ताव से उसकी माँ रेखा और पिता राकेश बहुत आहत होते है। इतना ही नहीं ममता कालिया ने उपन्यास में कुछ गौण पात्रों के जरिए ऐसे प्रसंगों का वर्णन किया है जिसमें चोट खाए माताओं तथा पिताओं की विवशता स्पष्ट दिखती है।
लेखिका ममता कालिया कहती हैं कि भूमंडलीकरण और आधुनिक औद्योगिक समाज ने इक्कीसवीं सदी में युवाओं के सामने एकदम नए तरीके का रोजगार और नौकरी के रास्ते खोल दिए हैं | नहीं तो पहले कुछ गने - चुने ही रास्ते थे जिन पर चलना माता - पिता और विद्यार्थियों जीवन का उद्देश्य हो जाता था जैसे , सिविल सर्विसेस, मेडिकल ( डॉक्टरी) इंजीनियर और यह भी परिवार की परंपरा के अनुसार लोग चुनते थे लेकिन आधुनिक दुनिया सभी के लिए अनेक अवसर उआपलब्ध करा दिए हैं जिसमे आप - अपना कैरियर बना लें |पहले बाजार भी इतना आकर्षक नहीं था नाही इतना विशाल था |, पहले बाजार में जरूरत की कुछ गिनी - चुनी वस्तुएं मिल जाति थी लेकिन आज एक वस्तु के अनेक वेराइटी उपलब्ध हैं| चाहे वह खाने - पीने की चीजों हों या सुख - सुविधाओं की वस्तुएं हों |और इसी कारण बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद ( कन्सूमर )का जन्म भी हुआ | इसके कारण हर खरीददार भी चतुराई से अपनी पसंद, जरूरत की छीजे बहुत खोजबीन करके खरीदता है और बहुत सोच - समझकर खर्च करता है | खासकर इस युग के प्रतिभाशाली जवानोंने बाजार की कमान अच्छी से सम्हाल लि वे अपने कैरियर में आगे तो बहुत निकाल गए लेकिन अपने रिश्तों, परिवार , संबंधों को बहुत पीछे छोडजकर आगे निकल गए है, कुछ लोग अपने बअच्छों को सपने दिखाने और पूरे करने की दौड़ में आगे निकाल गए तो अपने ही बच्चों से हाथ धो बैठे और अगर बच्चे इस आधुनिक दौड़ में आगे निकाल गए तो रिक्षे भी बहुत व्यावसायिक बना लिए | तो यह दौड़ नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी दोनों के दौड़ की कहानी जिसमे हम देखेंगे की सभी अकेले ही रह जाते हैं और दोनों पीढ़ी अपने संबंधों , मानवीय रिश्तों से खाली हो जाति हैं| सुख - सुविधाओं का सामान जुटाना ही जीवन का उद्देश्य हो गया, अपनी उपसतिथि की कमी को बच्चों ने इंपोर्टेड सामान से कंपनसेट करना एक आसान रास्ता निकाल कर अपने - आप को अपराध भावना से मुक्त कर लिया लेकिन दौड़ का यह दर्द आँख खोलने के लिए काफी है | साथ ही बाजार के चमक - दमक की सच्चाई भी इसमे बताया गया है किस प्रकार बाज़ारवाद ने उपभोक्ताओं को बेवकूफ बनाने के रास्ते निकाल लिए हैं|| व्यावसायिकता से रोजगारवाद का जन्म हुआ तो रिश्तों को भी व्यावसायिक बना दिया, इस रोजगारवाद ने पारिवारिक संबंधों को, पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों को तिलांजीली दे दी | विज्ञापान से वस्तुओं की सच्चाई और पवन , सघन जैसे पात्रों से मार्केटिंग और बाजार की नीतियों का परिचय कराया, जिसमें सबंध केवल व्यक्ति हैं चाहे वे माता - पिता हों या पति - पत्नी |
उपन्यास के शुरू अध्यायों में सभी के कम्पनियों के प्रोडक्ट्स तथा उन्हें बेचने की चुनौतियों तथा अन्य व्यवसाय जगत् की समस्याओं का चित्रण किया है। मानवीय सम्बन्धों के टूटन एवं खिंचाव को पवन, सघन तथा स्टेला के जरिए उन्होंने बखूबी चित्रित किया है। जब पवन इलाहबाद अपने माँ-बाप से मिलने जाता है तो वे लोग उसे इलाहाबाद के आस-पास ही कही जॉब ढूंढने को कहते हैं। उन्हें आशा थी कि इस तरह वे अपने बेटे के कैरियर में रूकावट भी नहीं बनेंगे और पवन भी उनके पास रह सकेगा। लेकिन पवन की सोच और दृष्टिकोण कुछ अलग ही होते है। वह अपने पिता के कलकत्ते जाकर बसने के सलाह पर कहता है, “पापा मेरे लिए शहर महत्त्वपूर्ण नहीं, कैरियर है। अब कलकत्ते को ही लिजिए। कहने को महानगर है पर मार्केटिंग की दृष्टि से एकदम लद्धड़। कलकत्ते में प्रोड्यूसर्स का मार्केट है, कंज्यूमर्स का नहीं। मैं ऐसे शहर में रहना चाहता हूँ जहाँ कल्चर हो न हो, कंज्यूमर कल्चर जरूर हो। मुझे संस्कृति नहीं उपभोक्ता संस्कृति चाहिए, तभी मैं कामयाब रहूँगा।उसके इस एक जवाब ने माता-पिता चौंक गए |
वह आइडियलिस्टिक की जगह प्रेक्टिकल था। इतना ही नहीं जितने दिन वह घर पर रहता है उतने दिन उसका व्यवहार अपने माता-पिता से, विशेषकर माँ से एक पराए व्यक्ति जैसा रहता है। यहाँ तक कि धोबी से इस्त्री होकर आए कपड़ों के लिए पवन ज्यादा पैसे दे देता है तो उसकी माँ उसे समझाती है कि यदि वह टूरिस्ट की तरह पैसे देता रहेगा तो ये लोग सिर चढ़ जाएंगे। लेकिन पवन अपनी माँ की इस बात पर हंगामा खड़ा कर देता है। अपने दफ्तर में मिल रही इज़्ज़त का हवाला देकर माँ को ताने दे बैठता है।
साथ ही वह यह भी कहता है कि उसके जन्मदिन पर उसे ग्रीटिंग कार्ड नहीं भेजा गया जिससे उसके ऑफिस के लोग उसकी हँसी उड़ाते है। पवन जानता था कि उसकी माँ किस प्रकार उसका जन्मदिन मनाती है लेकिन उसके ताने से “माँ को लगा उन्हें अपने बेटे को प्यार करने का नया तरीका सीखना पड़ेगा।पवन इस बात से भी उखड़ा हुआ था कि अब उसके कोई भी दोस्त शहर में नहीं रहे, सब-के-सब कैरियर के लिए बाहर जा चुके है। वह स्वयं यथार्थवादी है परन्तु उसी के जैसा व्यवहार दूसरो से मिले ये उसे मंजूर नहीं। अपने पिता से भी वह बिना बात के बहस करता है। उसके पिता के विचार उससे मेल नहीं खाते। धर्म, आध्यात्मिकता, दर्शन, अर्थशास्त्र जैसी बातों पर पवन और उसके पिता के विचार अलग-अलग हो जाते है। उसके पिता जहाँ नई और पुरानी चीज़ों और व्यवस्थाओं की तुलना करते हुए पुराने के समर्थन में बोलने लगते है तो पवन उन्हें यह कहकर आलोचना कर देता है कि उसके पिता नई चिज़ों का फायदा भी उठाते है और उसकी आलोचना भी करते है। धर्म के विषय में तो वह अपने पिता से बिलकुल भी सहमती नहीं जताता।उसके पिता बचपन से शंकर के अद्वैतवाद के बारे में उसे बताते आ रहे थे लेकिन पवन अपने नए आधुनिक आध्यात्मिक गुरू को ही अधिक मान्यता देता है तो उसके “पिता आहत हो देखते रह गए। उनके बेटे के व्यक्तित्व में भौतिकतावाद, अध्यात्म और यथार्थवाद की कैसी त्रिपथगा बह रही थी।” पवन अपने विचारों से न केवल माता-पिता को दुखी करता है बल्कि उसके जीवन साथी के चयन तथा उसके साथ वैवाहिक जीवन के एक अजीब तरीके से भी वह उन्हें दुख पहुँचाता है।
पवन स्टेला से अहमदाबाद में मिला था, तब से दोनों के सम्बन्ध घने होने लगते है। जब रेखा और राकेश को इसका पता चलता है तो राकेश रेखा को अहमदाबाद में ही देख आने को कह आता है। रेखा को स्टेला बिलकुल पसन्द नहीं आती। इतना ही नहीं जब स्टेला के दिए गए उपहार को भी रेखा अस्वीकार कर देती है तो पवन कहने लगता है कि वह बहुत मंहगा उपहार था जो अब व्यर्थ जा रहा है। पवन स्टेला के मामले में अपनी माँ से यहा तक कह देता है कि जब उसके पिता ने उनसे विवाह करने की ठानी थी तब उसकी दादी ने भी रेखा को पसन्द नहीं किया था तब क्या उसके पिताजी रूके थे।रेखा को अपने ही बेटे से यह बात सुनकर धक्का लगता है। किसी प्रकार पवन स्टेला के मामले में अपने अभिभावकों को मना लेता है फिर अपने स्वामी जी द्वारा लगाए गए रामकृष्णपुरम में सामुहिक विवाह आयोजन में विवाह कर लेता है। रेखा और राकेश को इससे थोड़ा दुख भी पहुँचता है।पवन और स्टेला मुश्किल से कुछ दिन घर पर रहते है कि तभी पवन के चैन्ने जाने और स्टेला के राजकोट और अमदाबाद में बिजनेस की बागडोर सम्भालने की बात सामने आती है। रेखा और राकेश दोनों पवन को समझाते लगते है कि शादी के बाद साथ रहना जरूरी होता है। उसे विवाह के वचनों का भी वास्ता देते है पर पवन फिर से अपने आधुनिक यथार्थवादी विचार उनके सामने यह कहकर रखता है कि पापा आप भारी-भरकम शब्दों से हमारा रिश्ता बोझिल बना रहे हैं। मैं अपना कैरियर, अपनी आज़ादी कभी नहीं छोड़ूँगा। स्टेला चाहे तो अपना बिजनेस चैन्ने ले चले।
पवन के लिए कैरियर इतना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि वह शादी की ज़िम्मेदारियों को भी परे हटा देना चाहता है। वह स्टेला के busy रहने की बात करता है। रेखा और राकेश को यह अजीब सा लगता है कि उनका दाम्पत्य जीवन सेटेलाइट और इंटरनेट के जरिए चलेगा। पवन और स्टेला के चले जाने के बाद सघन (पवन का छोटा भाई) भी अचानक उन्हें यह सूचना देता है कि उसे ताइवान में नौकरी लग गई है और वह भी चला जाता है। रेखा और राकेश अब अकेले हो जाते है। रेखा और राकेश जिस बात से घबरा रहे थे आखिर वही बात होती है। वे जिस गली में रहते थे उसे बुढ्ढा-बुढ्ढी गली कहा जाता है क्योंकि सभी के घरों के चिराग अपने माँ-बाप को छोड़कर कैरियर बनाने के लिए दूसरे शहरों तथा विदेश चले जाते है। रह जाते है तो सिर्फ बूढ़े माँ-बाप, एक कार, एक कुत्ता और उनके घरों में उनके बच्चों द्वारा भेजी गए महंगी चीज़े।रेखा को भी पवन माइक्रोवेब और वी सी डी दे जाता है लेकिन रेखा को इन चीज़ों की कोई जरूरत नहीं थी। जरूरत थी तो बस इस बात की कि उसके घर में बसे सन्नाटे को तोड़ने की, खालीपन और अकेलेपन के ऊब से वह बाहर आना चाहती थी। फिर दोनों बच्चों के चले जाने पर इतना काम नहीं रह गया था कि वह किसी में व्यस्त रहकर अपना समय काट लेती। उसे इस बात के लिए अब खुद पर ही जैसे एक क्षोभ सा होने लगा था कि बचपन में उसी ने बच्चों को आगे बढ़ने की शिक्षा दी थी और आज जब वे आगे निकल गए है तो उसे उनसे दूर होने का गम सता रहा है। वह अजीबों-गरीब उलझनों में फंसी हुई थी।
उसे अब रह-रहकर अपने बच्चों के बचपन और उनके किस्से याद आ रहे थे। “उसका मन बार-बार बच्चों के बचपन और लड़कपन की यादों में उलझ जाता। घूम-फिरकर वही दिन याद आते जब पुन्नू छोटू धोती से लिपट-लिपट जाते थे। क्या दिन थे वे। तब इनकी दुनिया की धुरी माँ थी, माँ जो कह डे ब्रह्म वाक्य था, रेखा के कलेजे में हूक-सी उठती , कितनी जल्दी गुजर गए वे दिन अब तो दिन महीने में बदल जाते हैं और महीने साल में, वह अपने बच्चों को भर नजर देख भी नहीं पाती। वैसे उसी ने तो उन्हें सारे सबक याद कराए थे। इसी प्रक्रिया में बच्चों के अन्दर तेजी, तेजस्विता और तेज़ी विकसित हुई प्रतिभा, पराक्रम और महत्त्वकांक्षा के गुण आए। वही तो सिखाती थी उन्हें जीवन में हमेशा आगे-ही-आगे बढ़ों, कभी पीछे मुड़कर मत देखो।” और आज उसी सिख ने बच्चों को मुझसे छीन लिया |
ममता कालिया ने पवन, सघन और स्टेला के जरिए जहाँ पारिवारिक सम्बन्धों में आए विवशता को दर्शाया है तो वही एक ऐसे कटु सत्य के भी दर्शन कराए है जिससे प्राय वे सभी परिवार भुगत रहे है जिनके बच्चे प्रवासियों के तरह हो गए है। जिनके लिए पराया देश और वहा की सुख-सुविधा तथा नौकरी के झमेलों में फंसे हुए है। मिस्टर और मिसेज सोनी ऐसे ही दो मजबूर माता-पिता है। उनका बेटा सिद्धार्थ विदेश में जा बसा है। मिस्टर सोनी को अचानक दिल का दौरा पड़ता है और वे गुज़र जाते है। जब सिद्धार्थ को उसके फ़र्ज़ के लिए बुलाया जाता है तो बहाने बनाता है कि उसके घर तक आने में हफ्ते भर से अधिक लगेगा। वह अपनी माँ को समझाते हुए कहता है – “हम सब तो आज लुट गए ममा।
लोग बता रहे हैं मेरे आने तक डैडी को रखा नहीं जा सकता। आप ऐसा कीजिए, इस काम के लिए किसी को बेटा बनाकर दाह-संस्कार करवाइए। मेरे लिए तेरह दिन रुकना मुश्किल होगा।” मिन्हाज साहब के समझाने पर वह यह भी कहता है कि विदेश के मुर्दा घरों में माँ-बाप के शव महिनों पड़े रहते है और जब बच्चों को फुर्सत होती है तभी वे जाकर उनका अंतिम संस्कार करते है।
विशेषता: यह एक समाज की कड़वी सच्चाई है कि जब से बाज़ारवाद ने पूरे विश्व में अपना वर्चस्व कायम किया है तब से लेकर अब तक उसकी चमक-दमक में लोगों की ज़िन्दगी को पूरी तरह से अपने में समेटता चला गया है। पहले लोग अपनी आजीविका के लिए नौकरी करते थे, लेकिन आज लोग अपनी आजीविका के लिए नौकरी से अधिक आजीविका के अधिन एक मशीन बन चुके है वो भी पैसे कमाने वाली मशीन और पहले जहाँ वे आजीविका के लिए अपनी नैतिकता, जिम्मेदारी या मनुष्यत्व को खोना नहीं चाहते थे। लेकिन आज बाज़ारवाद ने लोगों के इन सब से कोसो दूर कर दिया है। आधुनिक समाज में चल रहे बाजारवाद तथा उपभोक्तावाद में सिमटती ज़िन्दगियों का परिचय कराता हुआ ये एक ऐसा उपन्यास है जो वर्तमान की सच्चाई दिखाता है और सीखने वाले इस से सिख भी सकते हैं कि पैसे कमाने के साथ अपनी आवश्यकता भी मालूम कर लेना चाहिए जिससे संबंधों पर इसका बुरा प्रभाव न पड़े ,स्वस्थ जीवन जी सकें |
प्रश्न : एक शब्द में उत्तर लिखिए;
पेज नंबर 9 - 11
- दौड़ उपन्यास का नायक कौन है ? पवन
- रेखा इलाहाबाद में क्या व्यवसाय कर रही थी ? अध्यापिका
- घर में चूहे का डर सबसे अधिक किसे लगता है ? सघन
- सघन का जन्म कौन सी योनि का है? मार्जार
- पवन के छोटे भाई सघन को और किस नाम से बुलाते है? छोटू
- बिजली आते ही कौन हॉट प्लेट पर कॉफी चढ़ाता है? दातार
- शिल्पा काबरा नाचती हुई किसके पास जाति है? चित्रेश
- एशियन पेंटस का मेनेजर पवन को कहाँ मिला था?नरुलाज
- नरुलाज में रोज कितने सिलेंडर की खपत होती है?
- पवन का पुराना शहर कौन सा है? इलाहाबाद
- छोटू को बचपन से कहाँ घूमने का चस्का था? बाजार
- मराठी में मेहमान जाते समय क्या कहने का रिवाज है?मि येतो/मैं आता हूँ
- गुजरात में मेहमान जाते समय क्या कहने का रिवाज है? आऊ जो/फिर आना
- पेज नंबर - 11 - 20
- पवन का घर अहमदाबाद से कितने किलो मीटर दूर है? 18
- पवन एम बी ए करने घर से कितने किलो मीटर दूर गया ? 18
- पवन को पहली नौकरी कौन सी कंपनी में मिली ? भाइलाल
- पवन को भाइलाल कंपनी के कौन से यूनिट सहायक मैनेजर की नौकरी मिली?एल पी जी
- पवन के साथ इलाहाबाद में स्कूल में कौन पढ़ता था? शरद
- शरद ने कौन सा पिज्जा ओड़र किया? जैन
- बेसन को 'चने नी लोट' कहाँ कहा जाता है? गुजरात
- शरद कौन सी कंपनी में काम करता था ? सन शाइन
- सन शाइन कंपनी क्या बेचती थी ? शू पोलिश
- खाने की मेस चलाने वाली औरतों को अहमदाबाद में क्या कहा जाता है? मौसी
- छुट्टी के दिन अनुपम क्या बनाता है ? लिट्टी चोखा
- पवन,शरद,दीपेन्द्र ,रोजविन्दर और शिल्पा को कहाँ घूमने का शौक था?बाजार
- रोजविन्दर कऔर किस पर रिपोर्ट तैयार कर रही थी?प्रदूषण
- इलाहाबद शहर की तुलना शिक्षा के क्षेत्र में किससे की गई है? ऑक्सफोर्ड
- 'विश्वास नी जोत घरे-घरे-गुर्जर गैस लावे छै' यह नारा किसकी कंपनी का है ? पवन /जी जी सी एल
- जी जी सी एल का दफ्तर कौन से नगर में है?मेम
- जी जी सी एल के दफ्तर के बगल में कौन सा स्कूल है?सेंट जेवीयर्स
- पेज नंबर - 21 - 23
- बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में तीन जादुई अक्षर कौन से हैं?एम बी ए
- शरद के पिता कहाँ के नामी चिकित्सक थे?इलाहाबाद
- 'पूरे मार्केट में बिल्ली छाई है' किसके मेनेजर कहते?शरद
- शरद किसके कठोर चेहरे से घबराता था?पिता
- रोजविन्दर ने पुरानी कंपनी छोड़कर कौन सी कंपनी में काम सम्हाला था?इंडिया लीवर
- रोजविन्दर ने पुरानी कंपनी छोड़कर इंडिया लीवर में कौन से डिवीजन में काम सम्हाला था? टूथपेस्ट
- पेज नंबर - 23 - 26
- किसके सौजन्य से तीन दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था?एनाग्राम फाइनेंस
- एनाग्राम फाइनेंस कंपनी के सौजन्य से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कहाँ के परिसर में हुआ था?गुजरात विश्वविद्यालय
- गुजरात किसकी रचना में विख्यात है?पंडाल
- पेज नंबर - 26 -46
- शनिवार की शाम को पवन अक्सर किसके घर जाता था? अभिषेक
- अभिषेक की पत्नी और बेटे का नाम क्या है? राजुल,अंकुर
- कंपनी ने पवन और अनुपम का तबादला कहाँ कर दिया? राजकोट
- जी जी सी एल (गुर्जर गैस कार्पोरेशन लिमिटेड) कहाँ के गावों में पैर पसार रही थी? सौराष्ट्र
- सूरत के पास कहाँ पर तेल के कुएं हैं? हजीरा
- जलराम बाबा का शक्तिपीठ कहाँ था? वीरपुर
- वीरपुर , राजकोट से कितनी दूर था? 50 किलो मीटर
- गुर्जर गैस का महत्व समझाकर पवन ने पुजारी से कितने कनेक्शन लिया? 6
- देखते ही देखते पवन और अनुपम ने कितने गैस कनेक्शन लिए?264
- किरीट देसाई ने पवन से कितने दिन की छुट्टी मांगी? चार/4
- चार दिन की छुट्टी लेकर किरीट कहाँ गया? सरल मार्ग कैंप
- राजकोट से कितने मील दूरी पर सरल मार्ग का कैंप लगा था? 13
- स्वामी जी अनुसार मेडिटेशन किसके लिए तैयार करता है? सोमवार/मंडे
- राजकोट जूनागढ़ लिंक रोड पर किसका बोर्ड लगा था? सरल मार्ग शिविर
- किरीट के स्वामी जी नाम क्या है? कृष्णा स्वामी
- कृष्णा स्वामी जी कौन सी कंपनी में काम करते थे? पी पी के
- पी पी के कंपनी में कृष्णा स्वामी जी कौन से पद पर काम करते थे? कार्मिक प्रबंधक
- अभिषेक कौन सी कंपनी में काम करता था? विज्ञापन
- अभिषेक किस के लिए मॉडल ढूंढ रहा था? टूथपेस्ट
- मॉडल की तलाश में अभिषेक कौन से ब्यूटीपार्लर जाता है? रोजेज
- ओजेज ब्यूटी पार्लर की मालकिन का नाम क्या है? निकिता रोजेज ब्यूटीपारलर की मालकिन की बेटी का नाम क्या है ? तान्या
- राजुल को कौन सी जगह ठीक नहीं लगती थी ? रोजर्ज ब्यूटी पारलर
- नौकरी छोड़ने के बाद किसे असुरक्षा की भावना आअ गई थी? राजुल
- अभिषेक ने कौन से टूथपेस्ट के लिए विज्ञापन बनाया था? स्पार्कल
- स्पार्कल की मॉडल कौन सा टूथपेस्ट इस्तेमाल करती थी? टिक्को
- स्पार्कल की मॉडल का नाम क्या है? लीना
- अभिषेक को टूथपेस्ट के लिए विज्ञापन का कौन सा सम्मान मिला? ससर्वश्रेष्ट
- स्टेला डिमैलों की कंपनी जी जी सी एल में क्या सप्लाई करती थी? कंप्यूटर
- स्टैला की उम्र क्या थी ? 24 वर्ष
- सघन कौन से शहर को साइबर सिटी बताता है? हैदराबाद
- पवन के माता - पिता का नाम क्या है? रेखा, राकेश
- पवन नौकरी में कौन से कल्चर को महत्व देता है? कंसयूमर
- रेखा का चचेरा भाई कहाँ पर मार्केटिंग मेनेजर था? नागपूर
- रेखा कौन सी नौकरी करती थी?अध्यापिका
- पवन को माँ का कौन सा शब्द पत्थर की तरह चुभ गया?टूरिस्ट
- पेज नंबर - 47 - 72
- मार्केटिंग मेनेजर्स की मीटिंग के सदस्यों को कहाँ ठहराया था? प्रेसिडेंसी
- जी जी सी एल कंपनी में पिछले 5 साल में कितने करोड़ का घाटा हुआ था? 60
- युवा मनेजरों में किसकी स्पीच से खलबली मच गई थी? एम. डी.
- जी जी सी एल एम डी के सेक्रेटरी का नाम क्याहै? गायकवाड
- स्टैला और पवन ने अपनी कुंडली कहाँ पर मैच की ?कंप्यूटर
- पवन और स्टैला के कितने गुण मिलते थे? 26
- स्टैला ने अपने माता पिता को अपाई शादी के विषय में कैसे बताया? ई मेल
- स्टैला के माता-पिता कहाँ गए हुए थे? शिकागो
- पवन को बताए बिना रेखा कहाँ पहुच गई ? राजकोट
- मिसेज छजलानी के घर कौन रहने गया? स्टैला
- रेखा , स्टैला को कैसी लड़की कहती है? सिलबिल
- रेखा को स्टैला नाम किसके कंकड़ की तरह रड़क गया? चावल
- पवन के नौकर का नाम क्या है? भारत
- स्टैला ने सुबह सुबह रखा को क्या दिया? गुलदस्ता
- स्टैला ने रेखा को किसकी कढ़ाई की चादर भेंट की ? शीशे
- स्टैला, रेखा के लिए कौन सी ट्रेन की तिकीट लाती है? राजधानी एक्सप्रेस
- रेखा स्टैला में किसके गुण देखना चाह रही थी? सती,सावित्री
- स्वामीजी का शिविर कहाँ लगाने वाला था? मनपक्कम
- स्वामी जी जन्म दिन कब आता है? 24 जुलाई
- पवन को नई नौकरी कौन सी कंपनी में मिली? मैल
- स्वामी जी के कार्यक्रम के अनुसार पवन की शादी कहाँ हुई? दिल्ली
- सघन के कंप्यूटर पार्टस किसने दिलआअ दिए? स्टैला
- स्टैला के आने से किसे नवजीवन मिला? सघन
- स्टैला किसके मैन्यु पर पारंगत थी? कंप्यूटर स्टैला किसके मेन्यू में यानादी थी? रसोईघर/कीचेन
- पवन किसे कंप्यूटर विजर्ड कहता है ? स्टैला
- स्टैला के पास किसके हस्ताक्षर की चिट्ठियाँ आती हैं? बिल गेट्स
- स्टैला ने रेखा की कहानियाँ कहाँ उतार दी? कंप्यूटर
- स्टैला कंप्यूटर के साथ और किसमे माहिर थी?करटे,ताइक्वांडो
- किसके सिंगापूर और ताइवान जाने की बात चल रही थी? पवन
- सॉफ्टवेयर का कोर्स करने सघन कहाँ चला गया? दिल्ली
- सिन्हा साहब के बेटे ने कहाँ पर फ्लेट खरीद लिया है? मुंबई
- सोनी साहब का बेटा एच सी एल की ओर से कहाँ चला गए? न्यूयार्क
- मजीठिया का छोटा भाई कहाँ पर हार्डवेयर का कोर्स करने गया और वहीं बस गया? कनेडा
- रेखा को किसकी आवाज मनहूस लगती ? वायस मेल
- सधन नौकरी करने कहाँ चला जाता है ? ताइवान
- रेखा को सघन में किसका चेहरा दिख रहा है?पवन
- पेज नंब - 73 - End
- राकेश को अपाना स्कूटर स्टार्ट करते समय किसकी याद आ जाती है? सघन
- बुड्ढा - बुड्ढी कालोनी में कौन सी छुट्टियों में रौनक दिखाई देती है?सर्दी-गर्मी
- असुरक्षा के अहसास से लड़ने के लिए जनकल्याण समिति कौन सा पाठ आयोजित करती है?सुंदर कांड
- रेखा को कौन सी बैठकों से दहशत होने लगी थी? मंगलवारीय
- पवन बचपन में कहाँ चढ़ गया था? जंतर-मंतर
- सघन ताइवान में कौन सी भाषा सीख रहा है? चीनी
- किसको दिल का दौरा पड़ा था? सोनी साहब
- मिसेज सोनी की उम्र क्या है? 64
- मिसेज सोनी की बेटी की शादी कहाँ हुई थी? देहरादून
- मिसेज सोनी के बेटे का नाम क्या है? सिद्धार्थ
- मि. सोनी को मुखाग्नि किसने दी ? भूषण
- पवन ढाका से माँ के लिए कौन सी साड़ी लाया था? ढाकाई
- ध्यान शिविर में पवन के बॉस कहाँ से आने वाले हैं ? सिंगापूर
- ध्यान शिविर में पवन के बॉस सिंगापूर से कहाँ आने वाले थे? मनपक्कम
- ताइवान में छोटू किसमे हिस्सा लेने लगा था?लोकल पॉलिटिक्स
- सघन को अपने बिजनेस के लिए कितने रुपायों की जरूरत थी?30-40 लाख
- "दौड़" उपन्यास की लेखिका ममता कालिया हैं |


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें