अग्निशिखा - नाटक - डॉ रामकुमार वर्मा

 अग्निशिखा - नाटक - डॉ रामकुमार वर्मा 

परिचय:

अग्नि अग्निशिखा लेखक रामकुमार वर्मा आचार्य चाणक्य की रीति - नीति , व्यवस्थाओं का परिचय है| मंच पर एक कुटी है जिसमें वे रहते हैं चाणक्य के रहने की व्यवस्था एकदम सन्यासियों के जैसी है वहां का वातावरण शांत साफ सफाई व्यवस्थित है, चाणक्य के घर में उनके दो शिष्य सारंग और हिमांशु रहते हैं जो घर की व्यवस्था की देखरेख भी करते हैं |सारंग जंगल से लकड़ियां लेकर आता है और हिमांशु से बातचीत करता है तथा वे दोनों लकड़ी काटने की प्रक्रिया को अपने आचार्य चाणक्य की शक्ति से जोड़ते हुए बातें करते हैं कि जिस प्रकार मैंने जंगल से लकड़ियां काटी ऐसा लग रहा था धरती से दुश्मनों का सफाया हो गए और यह कटी हुई लकड़ियां तो ऐसी लगती है जैसे दुश्मनों की बाहे हो |


नाटक के पात्र 

पुरुष - पात्र 

सारंग , हिमांशु : आचार्य चाणक्य के शिष्य 

सोमदत्त : विक्रमपुर जनपद का निवासी 

चाणक्य : सम्राट चन्द्रगुप्त का महामात्य 

शिखरसें : पावापुरी का निवासी , रविसेन के पिता 

रविसेन : शिखरसें का पुत्र 

पुरुषदत्त : अक्षवाध्यक्ष : 

भद्रभट : गजाध्यक्ष 

बलगुप्त : सम्राट चन्द्रगुप्त के संबंधी , अब आचार्य राक्षस के समर्थक 

राक्षस : स्वर्गीय महाराज नन्द के समर्थक 

मलयकेतु : सम्राट पर्वतक के युवराज 

भागूआरायां : मलयकेतु का मित्र 

वसुगुप्त : कुसुमपुर के समाहर्ता 

यसहोवर्माण : कुसुमपुर के अंतपाल 

पुष्पदन्त : कुसुमपुर के कार्यानतिक 

चन्द्रगुप्त :मगध सम्राट

          रोहित,चार,सैनिक,डौवारिक,सेवक आदि 

स्त्री पात्र 

रोहिणी : सोमदत्त की पत्नी 

सुवासिनी : स्वर्गीय महाराज नन्द की प्रमुख राजनर्तकी 

अलका : स्वर्गीय महाराज नन्द की प्रमुख नर्तकी 

https://youtu.be/bc17pd2ilf4


प्रथम अंक 

अग्नि अग्निशिखा लेखक रामकुमार वर्मा आचार्य चाणक्य की रीति - नीति , व्यवस्थाओं का परिचय है| मंच पर एक कुटी  है जिसमें वे रहते हैं चाणक्य के रहने की व्यवस्था एकदम सन्यासियों के जैसी है वहां का वातावरण शांत साफ सफाई व्यवस्थित है, चाणक्य के घर में उनके दो शिष्य सारंग  और हिमांशु रहते हैं जो घर की व्यवस्था की देखरेख भी करते हैं |सारंग जंगल से लकड़ियां लेकर आता है और हिमांशु से बातचीत करता है तथा वे दोनों लकड़ी काटने की प्रक्रिया को अपने आचार्य चाणक्य की शक्ति से जोड़ते हुए बातें करते हैं कि जिस प्रकार मैंने जंगल से लकड़ियां काटी ऐसा लग रहा था धरती से दुश्मनों का सफाया हो गए और यह कटी हुई लकड़ियां तो ऐसी लगती है जैसे दुश्मनों की बाहे  हो |

 आचार्य चाणक्य ने जिस प्रकार महाराज नंद के अमात्य अर्थात  उनके महामंत्री राक्षस की कूटनीति का नाश मुश्किल से किया, उसी मुश्किल से नखरे मैंने लकड़ियाँ  काटी है |नंद के  विषय में बताया गया है

मगध का अंतिम शासक नंद वंश का धनानंद था। उन्हें चंद्रगुप्त मौर्य ने हटा दिया गया था जो मौर्य वंश की स्थापना हुई। और चाणक्य तथा सम्राट चन्द्रगुप्त ने एक भ्रष्टाचार मुक्त साम्राज्य की स्थापना की|

(धानानन्द की मृत्यु के बाद उनके अमात्य/मंत्री का क्या हुआ ? ) मात्य राक्षस बहुत प्रतिभावान राजनीतिक गुणों से परिपूर्ण कुशल और बुद्धिमता में आचार्य चाणक्य से एक कदम आगे थे, वे दोनों एक ही गुरुकुल में थे ,चाणक्य से सीनियर थे | अपने सम्राट की मृत्यु के बाद चन्द्रगुप्त को मारने की योजना बनाते रहे लेकिन अफलता नहीं मिली , चन्द्रगुप्त उसकी योग्यता के कारण अपने राज्य में उन्हें मंत्री बनाना चाहते थे लेकिन संभव न हो सका| अमात्य राक्षस कहीं छुप गए और चन्द्रगुप्त ने कई योजनाएं बनाकर उन्हें ढूंढ निकाला | राक्षस सोचता था कि चन्द्रगुप्त उसे सजा देंगे लेकिन प्रथम मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने आदर पूर्वक अमात्य राक्षस से कहा की आप बहुत बुद्धिमान और प्रजा हितैषी हैं। आपने नंद वंश के अंतिम सम्राट धनानंद के साथ मिलकर मगध राज्य की प्रजा के लिए बहुत कल्याणकारी कार्य किए हैं। हम चाहते हैं कि आप हमारे साथ मिलकर मगध की प्रजा के लिए कल्याणकारी कार्य करते रहें क्योंकि आप एक कुशल राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ बुद्धिमान व्यक्ति है, जो इस राज्य के कल्याण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।)

जिस मुश्किल से नन्द  के अमात्य राक्षस की कूटनीति मुश्किल से खत्म हो पाए उसे मुश्किल से मैंने लकड़ियां काटी है तथा अब आचार्य चाणक्य की व्यवस्था में ऐसा लगता है मानों  पाटलिपुत्र में दुश्मन ढूंढने पर भी नहीं मिलते हैं तभी हिमांशु ने बताया कि वह कश  उखाड़ने गया था तभी कुश उखाड़ने में  उसका तेज धारदार डंठल (लकड़ी का सूखा ठूंठ ) पैर में छुप गया तभी सारंग याद कर तभी सारंग याद दिलाता है एक बार आचार्य चाणक्य की शिक्षा पूरी करने की इच्छा से जा रहे थे तभी 1 गया था और उन्होंने यह निर्णय लिया था कि ऐसे खुशियों का सर्वनाश करूंगा तब भी कोई दूसरा काम करूंगा | आचार्य चाणक्य के कार्य योजना लिस्ट को दर्शाती है कि वे रास्ते में आने वाले छोटे बड़े दुश्मनों का विश्वास रखते हैं यही इनकी कार्यनीति है |

चाणक्य ने जैसे दुश्मनों को जड़ से मिटा दिया वैसे ही हमें भी दुश्मनों को कुश के समान हर छोटे - बड़े दुश्मनों का सफाया करते रहना चाहीये | जैसे आचार्य ने नन्द के सभी छोटे - बड़े साथियों को खत्म कर दिया था |आगे हिमांशु और सारंग की बातचीत से पता चलता है कि मगध के इतने बड़े साम्राज्य और सम्राट चन्द्रगुप्त के महामंत्री चाणक्य एक साहारण सी कुतिया में रहते है और भोजन के लिए तिल और धान है उनकी कुतिया में ! अगर कोई अन्य मंत्री हो तो विशाल महल में रहता और छप्पन भोग सुबह - शाम खाता लेकिन आचार्य ने अपने रहने के लिए कुतिया चुना| उनका मानना है कि व्यक्ति बड़े महल में रहने से बड़ा नहीं बनाता बल्कि अपने विचारों से बड़ा बनाता है | एक बार सम्राट चन्द्रगुप्त ने आचार्य से काहा भी था कि मैं तो सुगंगा महल मे रहाता हूँ आपके लिए भी क महल होना चाहिए तो उन्होंने कहा कि मैं तो इतने बाद महल में रहता हूँ कि उसकी छत तो आकाश तक ऊंची है , मुझे किसी दूसरे महल की जरूरत नहीं है |यह भी कहा कि जनता के विश्वास से बढ़ाकर मेरे लिए कुछ नहीं है | वे हर समय प्रजा की भलाई की चिंता करते हैं , उन्होंने समाज की अच्छी व्यवस्था के लिए अर्थशास्त्र की रचना भी की , , वे मानते हैं की राजनीति तो समाज का एक अंग है और जब समाज स्वस्थ होगा तो राजनीति भी स्वस्थ होगी| समाज और राजनीति तो राज्य की दो आंखे हैं |

इस प्रकार हम देखते हैं कि हिमांशु और सारंग अपने आचार्य चाणक्य की महानता, रीति - नीति, विचार्यशैली, राजनीतिक, सामाजिक नीति, दंड विधान और क्षमा को आदि व्यवस्था प्रकाश डालते हैं कि तबही और औरत के रोने की करूँ आवाज सुनाई देती है तो वे कहते हैं कि जरूर कोई दुखियारी  ये के लिए आचार्य के पास आई है | वह और उसके साथ एक आदमी भी है जो अपना परिचय इस प्रकार देती है कि मैं सोमदत्त हूँ , मेरे पिता यशदत्त है और मेरी पत्नी यह रोहिणी है, हम विक्रमपुर जनपद के रहने वाले हैं | इन दोनों को भी जब पता चलता है कि इतने बड़े सामराज्य के महामंत्री इस कुतिया में रहते हैं तो उनके भी आश्चर्य  का ठिकाना नहीं होता है और यहाँ आने वाले सभी से आचार्य मिलते हैं, सभी की बात सुनते हैं , सच्चा न्याय करते हाँ, कुतिया के गर्भगृह में बैठकर राजनीतिक गुत्थियाँ सुलझाते हैं, सामाजिक व्यवस्था की जानकारी के लिए समाज में उनके गुप्तचर नगर में घूम - घूमकर समाज की स्थिति की जानकारी उन्हें देते हैं |

आचार्य चाणक्य जब आते हैं तो उन्हें रोहिणी और सोमदत्त की परेशानी का कारण पहले ही मालूम रहता है और वे आपनी तीक्ष्ण बुद्धि से उनके ही मुंह से सारी बातें उगलवाया लेते हैं कि उनकी बेटी अपराजिता की शादी शिखरसेन के टेते रविसेन से करना चाहते थे लेकिन शिखरसेना को अपने ऊंचे पद का घमंड था इसलिए मेरी बेटी से शादी की अनुमति नहीं दी तो मैंने अपनी बेटी की शादी दुसतरी जगह पक्की कर दि लेकिन शादी के पहले ही शादी का सारा समान चोरी चला गया जोसमें एक 500 पानों का हार भी था | अभी चाणक्य सोमदत्त और रोहिणी से बातचीत कर ही रहे थे कि वहाँ शिखरसें आअ जाता हैऔर बताता है कि उनका बेटा तीन दिनों से बिना कुछ बताए घर से चला गया है अब तक उसका कोई पता नहीं चला है | यह घटना भी चाणक्य जानते थे वे भी उससे सीधी -  सीधी बात करते हैं कि अपराजिता से  शादी  नहीं होने के कारण दुखई होकर घर से चला गया है एर यह बताते है कि उसने सोमदत्त के घर चोरी की और चोरी के अपराध में उसके हाथ काट लिए जाएंगे यही यहाँ का न्याय  है|| इस पर रोहिणी घबरा जाति है और सजा काम करने को कहतीहै तो वे कहते हैं की एसे भावनाओं में बहकर शासन नहीं चलता जो सही न्याय है वह करना ही पड़ेगा|शिखरसें भी कहता है कि उस पर कुछ धन का जुर्माना कर दीजिए उसे मई चुका दूंगा लेकिन हाथ मत काटिए तबही सारंग बताया है कि कुएं पर एक नौजवान आत्महत्या की कोशिश कर रहा था उसे रोककर आपके पास लाए है और वे रविसेन को भी वहाँ ले आते है और वह भी सभी बाते जल्दी से काबुल कर लेता है और निराश होकर आत्महत्या करने जा रहा था || तब चाणक्य सजा सुनाते हैं कि तुमने दो अपराध किए हैं दोनों की सजा तुम्हें दी  जाएगी | चोरी के अपराध के लिए हाथ कैट जाएंगे और आत्महत्या के प्रयास के लिए तुम्हारे मीठे पर कबंध का निशान बनाया जाएगा ( कबंध = बिना सिर के शरीर ) यह सुनकर तीनों घबराजते हैं और सजा काम करने का अनुरोध करते हैं तो चाणक्य ने कहा कि 540 पान जराजकोश में जमा करना होगा | रविसेन के पिता कहते हैं कि इतना धन मई तुम्हें दूंगा तुम राजकोश में जमा कर दो लेकिन रविसेन कहता है कि मेरे अपराध की सजा है मई ही मेहनत करके धनराशि राजकोष में जमा करूंगा मुझे 6 माह  का समय दीजिए  |अपराजिता के माता - पिता को भी आश्वासन देते है और रविसेन के पिता भी अपने बेटे का आत्मसम्मान देखाकर खुश होते हैं और कहते हैं कि सोमदत्त की बेटी से रविसेन की शादी करने आपत्ति नहीं है , मेरा आशीर्वाद है |

रविसेन आचार्य चाणक्य से कहता है कि गुरु देव आपके न्याय और दंड विधान से हम सभी का भला हुआ है |

इसके बाद आचार्य यज्ञ करने के लिए तइयाऋ करने को अपने शिष्य से कहते हैं और जाते - जाते कहते हैं कि "पातलीपुत्र की समृद्धि में प्रत्येक व्यक्ति की सेवा और साधना हो तथा नन्द के मंत्री राक्षस से कुसुमपुर की रक्षा हो |


https://youtu.be/bc17pd2ilf4

विशेषता:

*महामंत्री चाणक्य के उदात्त चरित्र की झांकी मिलती है कि वे किस साधारणता से अपना जीवन बिताते हैं और अपने सम्राट, राज्य और प्रजा के शुभचिंतक हैं |

*राजनेता शासक नहीं बल्कि सेवक होता है |

*न्याय और दंड व्यवस्था बहुत पारदर्शी है |

*अपनी योग्यता से युवावर्ग में आत्मसम्मान जगाने का बहुत अच्छा उआदाहरण रविसेन है |

*अपराजिता अपने माता - पिता की आज्ञाकारी संतान है |

*आत्महत्या का अपराध जीवन के प्रति, परिवार के प्रति, समाज के प्रति एक जघन्य अपराध है |

*प्रेम की सुंदर व्याख्या की गई है कि वियोग में पड़कर प्रेम अधिक मजबूत बनाता है |

* माता - पिता के कोमाल हृदय को बताया है कि वे सदा संतान की भलाई की चिंता करते है |

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द्वितीय अंक 

दूसरा दृश्य रात के अंतिम पहर का है 

कुसुमपुर से बाहर जंगल का दृश्य है 

गहने जंगल मे एक सजी हुई झोपड़ी है उसमें अंदर दीपक जल रहा है और बाहट तक उसका प्रकाश फैल रहा है |दो व्यक्ति काले कपड़े पहने हुए हैं एसा लगता है कि वे अपने को छुपाने की कोशिश में काले कपड़े पहने हैं|वे दोनों आपस में फुसफुसाकर बातें कर रहे हैं |

ये दोनों आदमी भद्रभात और पुरुषदत्त हैं | पहले ये सम्राट चन्द्रगुप्त और चाणक्य की सेना में थे किन्तु चाणक्य ने उँ पर शक्कर के निकाल दिया था | पुरुषदत्त ने बताया कि चाणक्य ने हमें शराब पीने वाला और वासना में दुबे रहने वाला बताकर हमारे अधिकार हमसे छीन लिए , हमारे साथ धोखा किया |  अब ये दोनों सम्राट नन्द के महामंत्री राक्षस की शरण में आए हैं |

भद्रभात - का नाम अंकुश है जो चन्द्रगुप्त की सेना में गजाध्यक्ष अर्थात हाथियों की सेना का सेनापति था\

पुरुषदत्त - का नाम वालगा  है जो चन्द्रगुप्त की सेना में अश्वाध्यक्ष अर्थात अश्व/ घोड़े  की सेना का सेनापति था\

बालगुप्त - सम्राट चन्द्रगुप्त और चाणक्य के संरक्षण में मंत्री पद पर थे और चन्द्रगुप्त के संबंधी भी थे किन्तु वे अब सम्राट नन्द के महामंत्री राक्षस के पास अपनी सेवाएं देनी आअ गए हैं |

सुवासिनी - सम्राट नन्द के साम्राज्य के रंगशाला की प्रमुख नर्तकी है , रा जरानी के समान इसका  वैभव  था| किन्तु नन्द की मृत्यु के बाद राक्षस , बालगुप्त को सुवासिनी की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपते है ,उसे अपने  संरक्षण में रखते है और राजनीति में भी की सलाह लेते हैं |

राक्षस - सम्राट नन्द के महामंत्री है , बहुत ही कुशाग्र बुद्धिवाले है , राजनैतिक निर्णयों से आचार्य चाणक्य को भी भयभीत करते रहते हैं इसलिए आचार्य चाणक्य ने नन्द के इस महामंत्री का नाम राक्षस रख दिया है उसे राक्षस के नाम से पुकारने लगे |


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