ठुकरा दो या प्यार करो - - सुभद्रा कुमारी चौहान

ठुकरा दो या प्यार करो



एक गहन भावपूर्ण, समर्पण भाव से भरपूर ,सुभद्रा कुमारी चौहान की यह कविता " ठुकरा दो या प्यार करो " में उन्होंने इस चिर सत्य का रूप दिखाया गया  है कि पूजा तथा अर्चना के लिए किसी वस्तु की जरूरत नही है। मनुष्य के भाव यदि निर्मल और स्वच्छ हैं तो भगवान भक्त को भी उसी दृष्टि से देखता है । अपनी भावों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर कवयित्री ने इस कविता में यह संदेश देने का प्रयास किया है कि भगवान भाव दिखावे , चढ़ावे से कोई मतलब नहीं हैं,उन्हे प्रसन्न करने के लिए भक्तों के निर्मल मन का प्रेम ही पर्याप्त है। मन साफ होना चाहिए , भगवान पूजा की सजी थाल नहीं देखते बल्कि मन की सरलता को देखते है|

ठुकरा दो या प्यार करो

विशेषता:

1)सरल एवं सहज भाषा का प्रयोग किया है।

2)प्रेम के पवित्र रूप को दिखाया है।

3) बाह्य आडम्बरो, दिखावा का विरोध  है।

4) भाषा में आक्रोश विद्यमान है।

5) दिखावे का वर्णन है।

देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं ।

सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं ॥

भगवान आपके तो कई सारे भक्त है जिसमे अमीर -  गरीब सभी हैं और सभी अपनी - अपनी हैसियत से पूजा - चढ़ावा लेकर आते हैं  और जिसकी जैसी भावना होती है उस तरीके से तुम्हारी भक्ति करते है |आपको खुश करने के लिए की सारे महंगे - महंगे चिजे लाते है, रंग - बिरंगे उपहारों को आपके चरणों में चढ़ाने लेकर आते हैं |

शब्दार्थ: उपासक - भक्त |बहुमूल्य - कीमती|

भेंट - उपहार /चढ़ावा|

धूमधाम से साजबाज से मंदिर में वे आते हैं ।

मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुएँ लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं ॥

धूमधाम-अत्यधिक उमंग |साजबाज -दिखावा |मुक्तमणी - रत्न |

मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी ।

फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी ॥

गरीबीनी-गरीब स्त्री| साहस - धैर्य

धूप दीप नैवेद्य नहीं है झांकी का शृंगार नहीं ।

हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं ॥

नेवैद्य - भगवान का भोग |शृंगार - सजावट |

हार - माला |

मैं कैसे स्तुति करूँ तुम्हारी ? है स्वर में माधुर्य नहीं ।

मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं ॥

स्तुति - प्रार्थना ,पूजा| माधुर्य -मिठास |चातुर्य - चालाकी | स्वर - आवाज , वाणी |

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा ख़ाली हाथ चली आयी ॥

पूजा की विधि नहीं जानती फिर भी नाथ! चली आयी॥

शब्दार्थ: दान - चढ़ावा |नाथ - भगवान |

पूजा और पुजापा प्रभुवर ! इसी पुजारिन को समझो ।

दान दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो॥

पुजापा - पूजा की सामग्री |निछावर - चढ़ाना |

मैं उन्मत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ ।

जो कुछ है, बस यही पास है इसे चढ़ाने आयी हूँ ॥

उन्मत्त - मतवाला , अत्यधिक |हृदय - दिल|

चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो ।

यह तो वस्तु तुम्हारी ही है, ठुकरा दो या प्यार करो ॥

अर्पित - समर्पित |ठुकरा - स्वीकार न करना |

प्रश्न 1: एक शब्द या वाक्य में उत्तर लिखिए: 1 x10=10

  • भगवान के पास उपासक कैसी भेंट लाते हैं? बहुमूल्य
  • साजबाज से उपासक कहाँ जाते हैं ? मंदिर
  • मुक्तमणी कौन चढ़ते हैं? उपासक
  • कौन मंदिर में कुछ नहीं ले जाति है? गरीबनी
  • गरीबनी साहस कर कहाँ चली आई ? मंदिर
  • गरीब भक्त के पास किसका हार नहीं है ? फूलों
  • गरीब भक्त के मन का भाव प्रकट करने के लिए वाणी मे क्या नहीं यही? चातुर्य
  • स्तुति करने के लिए वाणी में क्या नहीं है ? माधुर्य
  • बिना दान - दक्षिणा के वह कैसे मंदिर चली आई? खाली हाथ
  • पूजा और पुजापा प्रभु से किसे समझने को कहती है?पुजारिन
  • भक्त किसकी विधि नहीं जानती? पूजा
  • दान दक्षिणा किसे समझने को कहती है? भिखारिन
  • उन्मत्त प्रेम की प्यासी क्या दिखाने आई है? हृदय
  • भक्त अपने को कहाँ अर्पित करती है ? भगवान के चरणों में
  • कवयित्री ने पूजा और पुजापा किसे मानने को कहा है ?स्वयं
  • "ठुकरा दो या प्यार करो" कविता के रचनाकार का नाम क्या है? सुभद्रा कुमारी चौहान

  • प्रश्न 2 ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए; 2 x7=14
  • प्रसंग: ठुकरा दो या प्यार करो कविता काव्य संकलन 'काव्य सरस ' मे संकलित काव्य से लिया गया है, पद्य है, कवित्री सुभद्रा कुमारी चौहान हैं |

    संदर्भ: ठुकरा दो या प्यार करो कविता में कवयित्री ने यह दिखाया है कि भगवान की उपासना सच्चे ह्रदय से की जाती है, न कि ठाट-बाट और आडंबरों से।

    व्याख्या: कवियित्री कहती है, हे भगवान् आपके भक्त बहुत है। जो आपके लिए बहुमूल्य वस्तुएं अपने साथ लाते हैं। बहुत धूमधाम के साथ वह मंदिर आते हैं। और खुद भी बहुत सज कर आते हैं। परंतु मैं गरीब हूं मेरे पास आपके देने के लिए कुछ नहीं हैं। फिर भी में पूजा करने आई हूं। ना मेरे पास दीया है जिससे में आरती करू,ओर ना ही आपके श्रृंगार के लिए कुछ है। कवियित्री अपनी दुखद स्तिथि की ओर इशारा करते हुए कहती हैं हाय!मेरे पास फूलों की माला भी नहीं हैं। कवियित्री कहती है,मेरी आवाज भी ठीक नहीं हैं में आपके लिए भजन भी नहीं गा सकती। मै इतनी चतुर भी नहीं जो अपनी में के भाव को प्रकट कर सकू। मेरे पास दान करने के लिए कुछ नहीं हैं। मुझे पूजा का तरीका नहीं आता। हे भगवान अपनी भक्तन को समझो और मेरी भक्ति को ही मेरा दान समझो। मैं अपने हृदय से आपकी पूजा करने आई हूं। मैने आपको अपनी भक्ति दी है,आप इसे चाहो तो स्वीकार करो या ना करो।

  • विशेषता: सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रस्तुत कविता " ठुकरा दो या प्यार करो " में उन्होंने इस चिर सत्य का रूप प्रस्तुत किया है कि पूजा तथा अर्चन के लिए किसी वस्तु की जरूरत नही है। मनुष्य के भाव यदि निर्मल और स्वच्छ हैं तो भगवान भक्त को भी उसी दृष्टि से देखता है । अपनी भावों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर कवयित्री ने इस कविता में यह संदेश देने का प्रयस किया है कि भगवान भाव के भूखे होते हैं,उन्हे प्रसन्न करने के लिए भक्तों के निर्मल मन का प्रेम ही पर्याप्त है।

  • प्रश्न 4: टिप्पणी लिखिए ; कोई एक 5 x 1 =5

    1. सच्ची भक्ति

  • यह शीर्षक ठुकरा दो या प्यार करो काव्य संकलन 'काव्य सरस ' मे संकलित काव्य से लिया गया है, पद्य है, कवित्री सुभद्रा कुमारी चौहान हैं |

    सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रस्तुत कविता " ठुकरा दो या प्यार करो " में उन्होंने इस चिर सत्य का रूप प्रस्तुत किया है कि पूजा तथा अर्चन के लिए किसी वस्तु की जरूरत नही है। मनुष्य के भाव यदि निर्मल और स्वच्छ हैं तो भगवान भक्त को भी उसी दृष्टि से देखता है । अपनी भावों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर कवयित्री ने इस कविता में यह संदेश देने का प्रयस किया है कि भगवान भाव के भूखे होते हैं,उन्हे प्रसन्न करने के लिए भक्तों के निर्मल मन का प्रेम ही पर्याप्त है।

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