ऐतिहासिक घटना पर आधारित नाटक

 अग्निशिखा - रामकुमार वर्मा 



लेखक परिचय: जन्म 15 सित. 1905 , सागर जिला, मध्यप्रदेश में हुई| सन  1090 में आपका निधन हुआ| आधुनिक हिन्दी साहित्य में आधुनिक हिन्दी साहित्य में ' एकाँकी सम्राट' के रूप में प्रसिद्ध हैं| इसके अतिरिक्त व्यंग्यकार और हास्य  कवि के रूप में भी आपकी पकड़ मजबूत थी | बचपन से ही प्रतिभाशाली थे , माताजी राजरानिदेवी अपने समय की सफल कवईईटरी थी| घर पर ही रामकुमार जी शिक्षा दिलाई | सं 1022 असहयोग आंदोलन भाग लिया | इसके बाद अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाया | प्रयाग विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. और नागपूर विश्वविद्यालय से पी . एच. डी . की उपाधि प्राप्त की | प्रयाग विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक ( लेक्चरार ) के रूप में सेवाये देते रहे|





अग्निशिखा: समाज नीति  और राजनीति के गोद में पालने वाला यह नाटक आचार्य चाणक्य, चन्द्रगुप्त और अमात्य राक्षस के एटिहासिक व्यक्तित्व पर वास्तविक प्रकाश डाल सकेगा, एसा मेरा विश्वास है | पहले लेखक ने ' कौमुदी महोत्सव' नाम से नाटक की रचना की थी |वह एकाँकी नाटक होने के कारण केवल एक ही पक्ष को दिखा पाया | मौर्यकालीं इस नाटक से यदि हमारे देश के यशशवी महापुरुषों के महान चरित्र की सच्चाई सामने आती है ओ यही मेरे नाटक का उद्देश्य है | चाणक्य और राक्षस दोनों की राजनीति इतनी प्रखर है कि वह "अग्निशिखा' की तरह जल उठती है और यही नाटक की सार्थकता है और शीर्षक की सार्थकता को भी अंजाम देती है |




पात्र 
(प्रवेशानुसार)
पुरुष पात्र :
सारंग , हिमांशु : आचार्य चाणक्य के शिष्य 
सोमदत्त :विक्रमपुर जनपद का निवासी 
चाणक्य : सम्राट चन्द्रगुप्त का महामात्य 
शिखरसें : पावापुरी का निवासी 
रविसेन : शिखरसें का पुत्र 
पुरुषदत्त : अक्षवाध्यक्ष 
भदरभट्ट : गजाध्यक्ष 
बालगुप्त: सम्राट चन्द्रगुप्त के संबंधी, अब आचार्य राक्षस के समर्थक 
राक्षस : स्वर्गीय महाराज नन्द के महामात्य 
मलयकेतु: सम्राट पर्वतक के युवराज  
भागूरायाण  : मलयकेतु का मित्र 
वसुगुप्त : कुसुमपुर के समाहर्ता 
यसहोवर्माण : कुसुमपुर के अंतपाल 
पुष्पादन्त : कुसुमपुर के कार्यानतिक 
चन्द्रगुप्त : मगध के सम्राट 
अन्य पात्र - रोहित, चार, सैनिक, दिवारिक,सेवक आदि|

स्त्री पात्र : 
रोहिणी : सोमदत्त की पत्नी 
सुवासिनी : स्वर्गीय महाराज नन्द की प्रमुख राजनर्तकी 
अलका : स्वर्गीय महाराज नन्द की  राजनर्तकी 
सारांश: इतिहास की न भूलने वाली घटनाओं में राजनीति को नया रूप देने वाले आचार्य  चाणक्य  चाणक्य  का व्यक्तित्व एकदम अनोखा है  | उनका काला रंग और असुंदर रूप के भीतर कुशाग्र बुद्धि की चमक इतनी अधिक है एक पल में अपने ज्ञान से षडयंत्रों को भांप लेते हैं | तक्षशिला में आपने ज्ञान प्राप्त किया और विशेष योग्यता के कारण आचार्य पद का दायित्व हासिल किया | अपने ज्ञान से देश - विदेश के अनेकों विद्यार्थियों को शास्त्रों की ही शिक्षा नहीं दी बल्कि शस्त्रों के अचूक संचालन से राजनीति शिक्षा भी दी |आपका अमर , चर्चित ग्रंथ ' अर्थशास्त्र' में उन्होनें यह घोषणा की है कि - 
येन शस्त्रं च शास्त्रम च नंदराज गता च भू:,
अमर्षनोंद धृतान्याशु तेन शास्त्रमिदम कृतं |

शस्त्र और शास्त्र से ही जीवन में सफलता मिल सकती है| इसका स्पष्ट प्रमाण सम्राट चन्द्रगुप्त का एटिहासिक व्यक्तित्व है जो आचार्य चाणक्य के गुरुत्व में विकसित हुआ | राजनीति और समाजशास्त्र दोनों के संतुलित ज्ञान से मानव और मानव समाज का निर्माण होता है , संतुलित समझ पैदा होती है , सामाजिक व्यवस्था की जाणारी और व्यवस्था की समझ होती है| अगर दोनों में से एक किसी एक की अनदेखी हो जाति है तो जीवन की व्यवस्था भी अव्यवस्थित हो जाती  है | और ये दोनों दो आँखों के समान है | आचार्य चाणक्य ने  जितना मगध राज्य को व्यवस्थित किया , उतना ही अधिक मगध समाज को भी व्यवस्थित किया और जब समाज व्यवस्थित है तो परिवार व्यवस्थित होगा और जाव परिवार व्यवस्थित है तो हर व्यक्ति अपना - अपना दायित्व समझता है, अपने कर्तव्यों की पूर्ति करता है , तबही तो वह समय था जब घरों में ताले नहीं लगते थे क्योंकि चोरी नहीं होती थी और अगर एसा हो भी गया तो उसकी सजा इतनी कठोर होती थी कि दुष्कर्म करने वाला जीवन भर भुगतता था जिसके कारण कोई भी एसा करने का साहस नहीं कर सकता था \और यही सामाजिक व्यवस्था है तो किसी शस्त्र की तेज धार से कानम नहीं है |
आचार्य चाणक्य के राजनैतिक दृष्टिकोण पर अनेकों नाटक लिखे गए हैं किन्तु उनके सामाजिक दृष्टि पर रामकुमार वर्मा ने ही लिखा है | चाणक्य ने अपनी राजनीति में गुप्तचरों (spy जासूस, गुप्तचर, भेदिया, चरक, मुख़बिर) की एक सशक्त संस्था बनाई थी जिसके कारण दुश्मनों की कोई चाल चल नहीं पाती थी| गुप्तचर केवल राजनीति तक ही सीमित नहीं थे बल्कि समाज की गतिविधियों की सूचना भी लेते थे और आवश्यकता पड़ने पर सुधार करते थे , प्रजा का दुख और तकलीफ को दूर करते थे| समाज की व्यवस्था सुधारते थे,बुरी आदतों वालों पर अंकुश लगाते थे|

प्रथम अंक:
समाज - नीति के टकराहट को दिखाया है जी लेखक ने नाटक के द्वारा बताया है | इसमे आचार्य चाणक्य और सम्राट चन्द्रगुप्त का व्यक्तित्व आपस में सम्बद्ध है | लेखक कहते हैं कि बौद्ध और ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार छँरगुप्त मौर्य एक असाधारण व्यक्तित्व के मालिक थे |











  


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