प्रेमामृत - मीराबाई BBA 3 sem/ प्रसंग, संदर्भ, व्याख्या
1. राम रतन धन पायो, मैं तो राम रतन धन पायो।
खरचे नहिं कोई चोर न लेवे, दिन-दिन बढ़त सवायौं।
नीर न डूबे, वाकू अग्नि न जाले,धरणी धरयो न समायो
नांव को नांव भजन की बतियाँ, भवसागर से तारयौ |
मीरा प्रभु गिरधर के सरणे , चरण - कँवल चित्त लायो |
व्याख्या: मीरा अपने प्रभु की भक्ति में लीन होकर कहती हैं कि मुझे तो राम अर्थात भगवान की भक्ति रूपी धन मिला गया है, वे कितना सच कहती है कि यह जो धन है उसे ना तो कोई चोरी कर सकता है और तो और यह धन दिन पर दिन बढ़ता ही जाता है, यह ना तो पानी में डूबता है ना ही आग इसे जला सकती और यह इतना अधिक है कि रखने के लिए धरती भी कम पड़ेगी, भगवान के नाम का भजन करके नाम रूपी नाव बनाकर ही इस दुनिया रूपी भवसागर से तर जाऊँगी | मीरा प्रभु गिरधर की शरण मे है, उनके चरण कमल में ही मेरा मन लगाता है|
विशेषता: मीरा कृष्ण भक्त हैं यह सभी जानते हैं लेकिन यहाँ उन्होंने राम का नाम संकेत स्वरूप लिया है और वे कृष्ण की अनन्य भक्त हैं, भकतिरूपी धन की अनोखी व्याख्या की है|
शब्दार्थ:खरचे- खर्च करना , काम होना | वाकू - इसे |धरणी- धरती |नांव - नाम, नाव|सरणे - शरण में|
2. मैं गिरधर के घर जाऊं।
गिरधर म्हांरो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं॥
रैण पड़ै तबही उठ जाऊं भोर भये उठि आऊं।
रैन दिना वाके संग खेलूं ज्यूं तह्यूं ताहि रिझाऊं॥
जो पहिरावै सोई पहिरूं जो दे सोई खाऊं।
मेरी उणकी प्रीति पुराणी उण बिन पल न रहाऊं।
जहां बैठावें तितही बैठूं बेचै तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर बार बार बलि जाऊं॥
व्याख्या: मीरा कहती हैं कि गिरिधर मेरे सच्चे प्रीतम हैं, मैं तो उनके ही घर जाऊँगी, उनका लुभावना रूप देखते ही मैं बहुत आकर्षक है | आगे वे कहती हैं कि रात होते ही मैं उठकर उनके पास चली जाऊँगी और भोर होते ही सुबह होते ही वहाँ से वापस आ जाऊँगी |रात - दिन उनके साथ ही बिताना चाहती हूँ , उनके साथ ही खेलना चाहती हूँ और उन्हें हर तरह से खुश रखना चाहती हूँ | वे मुझे जो - जैसा पहनने को देंगे पहनूँगी और जो खाने को देंगे खाऊँगी | मेरी और गिरधर की प्रीत तो बहुत पुरानी है और उनके बिना तो एक क्षण भी रहना नहीं होता है | मीरा गिरिधर के प्रेम में इतनी दीवानी हो गई हैं कि वे जहां बैठायेंगे वहाँ ही बैठूँगी यहाँ तक कि अगर वे मुझे बेच दें तो मैं बिकने को भी तैयार हूँ| मैं तो अपने प्रभु पर बार - बार बलि होने को तैयार हूँ|
विशेषता: मीरा अपने भगवान को अपने पति के रूप में भी देखती हैं और पति की हर बात वे खुशी से स्वीकार करने को तैयार हैं|बार - बार उँ पर न्यौछावर होना चाहती हैं|
शब्दार्थ: म्हांरो -मेरा | साँचो - सच्चा | रैण-रात|वाके - उनके| रिझाऊं- खुश करूँ|
3. बदरा रे तू जल भर लायो
छोटी छोटी बूंदें बरसन लागे,
कोयल शबद सुणायो,
गाजे बाजे पवन मधुरिया,
अंबर बदरा छायो,
सेज सवारी, बदरा पिया घर आए,हिलमिल मंगल गायो,
मीरा के प्रभु हरी अविनाशी,
भाग़ भयो जिण पायो,
ओ बदरा, रे बदरा|
व्याख्या: मीराबाई कल्पना करती है कि प्रभु स्वयं उनके घर आए है और इस खुशी के अवसर पर प्रकृति भी इस में शामिल हैं और इस मौके पर बादल रे तुम जल भर लाए हो और स्वागत में छोटी - छोटी बूंदों की फुहार से स्वागत कर रहे हो, कोयल मधुर वाणी में जैसे स्वागत गीत गा रही है, हवा बह कर गाजे - बाजे से अपनी खुशी व्यक्त कर रहे हैं|आकाश पर गहने बादल छा गए हैं | यहाँ विशेष ध्यान देने वाली है कि कवित्री अपने आराध्य को अपने पति के रूप में भी देखती हैं और कहती हैं कि प्रीतम प्यारे मेरे घर आए हैं उनके के लिए मैंने सेज संवार कर रखी है उनके आगमन पर सभी सुहागने मिलजुलकर मंगल गीत गा रहीं है | मीरा के प्रभु तो अविनाशी हैं अर्थात अमर हैं और मेरा भाग्य बहुत उज्ज्वल था जो मेर प्रियतम अविनाशी हैं |
विशेषता: मीराबाई अपने आराध्य कृष्ण की अनन्य भक्त है और वे उनसे जितना प्रेम करती हैं उतनी ही आस्था, श्रद्धा के भाव मीराबाई की भक्ति को अनोखा बना देती है|
शब्दार्थ :बदरा- बादल|सुणायो-सुनाया |पवन-हवा |अविनाशी - अमर|
4. सयाम बिना सखी राहया ना जावां |
तन - मन - जीवन प्रीतम वार्यों, थारे रूप लुभावां ||
खानपान म्हने फीका लागां, नैन राहया मुरझावाँ |
निसि दिन जोवान बात मुरारी, कब रो दरसन पावाँ ||
बार - बार थारी अरज करूँ हूँ , रैन गया दिन जावाँ |
मीरा रे हरि थें मिलया बिन, तरस - तरस जिय जावाँ |
व्याख्या: इस पद में मीराबाई सहेली से कृष्ण के वियोग का दर्द को व्यक्त कर रही है कि श्याम के बिना रहना बहुत कठिन लग रहा है , तुम्हारा सुंदर रूप बहुत लुभावना है ,मैंने तन-मन-अपना जीवन तुम पर न्यौछावर कर दिया है | तुम बिन मुझे खाना -पीना फीका लगता है , आँखें सदा तुम्हें ही खोजती रहतीं हैं और न दिखने पर मुरझा जाती हैं | हर दिन बस आपकी ही राह देखती रहती हूँ ना जाने कब दर्शन पाऊँगी| वे बार-बार कृष्ण से विनती करती हैं कि ना जाने कब आओगे रात तो बीत गई ,दिन भी बीता जा रहा है | कृष्ण के बिन मीरा का जीवन तो बस तड़प-तड़प के बीत रहा है|
विशेषता: मीरा वियोग में तड़प रही हैं और वे चीजें जो सामान्य दिनों में अच्छी लगती हैं वे ही वियोग में दुख देने लगती है किसी भी चीज में रुचि नहीं लगती| इनके वियोग की यहाँ चरम दृश्य प्रस्तुत किया गया है|
थारे- तुम्हारा| राहया -रहते| जोवान - जोहना, राह देखना| अरज - निवेदन| रैन - रात |
5. जोगी मत जा मत जा मत जा |
पाईँ परूँ,मैं चेरी तेरी हौं , जोगी मत जा मत जया|
प्रेम भागती की पेडो ही न्यारी, हमकूँ गेल बता जा |
अगर चंदन की चीता बनाऊँ , अपणे हाथ जला जा||
जल - जल भई भसम की ढेरी,अपने अंग लगा जा|
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, जोत में जोत मिला जा |
जोगी मत जा मत जा मत जा |
व्याख्या: मीरा बाई कृष्ण जी को योगी कहते हुए बोलती है कि मैं तुम्हारी दासी हूँ, मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूँ तुम मुझे इस तरह छोड़कर मत जाओ | प्रेम और भक्ति का रास्ता बड़ा अनोखा है, इस पर चलना आसान नहीं तुम ही इसका रास्ता बताया दो, मुझे उस पर आगे बढ़ा दो | आगे वे कहती हैं जाते - जाते यह भी सुन लो कि मैंने तो अपने अंतिम संस्कार के लिए चंदन की चीता बनाई यही और मेरी इच्छा है कि तुम अपने हाथों से इसे जला जला देना और जलाकर बनी भस्म - राख को अपने शरीर पर मल लेना, मीरा अपने गिरधर नागर से कहती है कि अपनी - ज्योति में मेरी ज्योति मिला कर अपने में मुझे अंगीकार कर लो क्योंकि आपके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है , माँ आपकी हूँ मुझे अपने में समा लो |
विशेषता: मीरा का प्रेम और भक्ति अनन्य है, वे उनके लिए अपने को मिटाकर कृष्ण में विलीन होने की इच्छा अद्वितीय है |कृष्ण से भस्म शरीर पर लगाने को कहती है इसलिए चंदन की चिता बनाने कहा है कि कृष्ण को सुगंधित राख मिले |
शब्दार्थ: चेरी-दासी|भागती-भक्ति|जेल-रास्ता| भसम-राख |
प्रश्न 1: एक शब्द याक वाक्यांश में उत्तर लिखिए; 1 X10=10
- मीरा ने कौन सा धन पाया है? रामरतन
- कौन सा धन चोरा नहीं जा सकता? रामरतन
- मीरा का धन प्रतिदिन कितना बढ़ता जाता है? सवाया
- मीरा के अनुसार भवसागर किसके नाम रूपी नाव से पार हो जाएगी? भगवान
- मीरा किसके शरण में आअ गई है? गिरिधर
- मीरा भगवान के चरण किसके सादृश्य हैं? कमल
- मीरा किसके घर जाने की बात कहती है? गिरिधर
- मीरा के सच्चे प्रीतम कौन हैं? भगवान
- रात होते ही मीरा क्या करती है? चली जाती
- मीरा कब उठकर चली आती है? भोर /सुबह
- मीरा किसके हाथों बिकने को तैयार है ? कृष्ण
- मीरा ने बार - बार प्रभु क्या होना चाहती है? न्यौछावर
- 'प्रेमामृत' के रचनाकार कौन हैं? मीराबाई
- मीरा के आराध्य के आने पर कौन पानी लेकर आता है ?बदरा
- मीरा के प्रभु आने पर कोयल कैसा गीत गाती है?मधुर
- मीरा के प्रभु के आने पर कौन मंगल गाँ गया रही हैं?सुहागिनें
- मीरा अपने प्रभु को क्या कहती है कि वह कैसे हैं?अविनाशी
- मीरा को किसके बिना रहना मुश्किल लगता है?श्याम
- मीरा किससे कहती है कि श्याम बिना रहा नहीं जाता है?सखी
- प्रीतम के बिना मीरा को खानपान कैसा लग रहा है?फीका
- मीरा अपने लिए किसकी चिता बनाने कहती है?चंदन
- मीरा कृष्ण से अपने शरीर पर क्या लपेटन कहती है?भस्म
बदरा रे तू जल भर लायो, छोटी छोटी बूंदें बरसन लागे,
कोयल शबद सुणायो, गाजे बाजे पवन मधुरिया,
अंबर बदरा छायो, सेज सवारी, बदरा पिया घर आए,
हिलमिल मंगल गायो, मीरा के प्रभु हरी अविनाशी,
भाग़ भयो जिण पायो, ओ बदरा, रे बदरा|
- उत्तर
- प्रसंग: काव्य संकलन 'काव्य सरस' मे संकलित जो 'प्रेमामृत' कवयित्री मीराबाई है|
- संदर्भ: कवि संदेश दे रहे हैं|
- व्याख्या: पद्य 3 की व्याख्या देखें |
- विशेषता: पद्य 3 की विशेषता देखें|
- शब्दार्थ: पद्य 3 के शब्दार्थ देखें |
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