कबीर - साखी - कबीरदास
भावार्थ / अर्थ / सरल व्याख्या
भाई रे चुंनबिलूटा खाई
बाघिन भई सवाहीन के
खसम न भेद लगाई || टैक
सब घर फोरि बिलुटा कहायौ, कोई न जाने भेद |
खसम निपूतों आंगणि सुतो , रांड न दाई लेव |
पड़ोसिनी भई वीरानी , माही हुई घर घाले |
पाँच सखी मिली मंगल गावै, यह दुख यकों सालै |
प्रसंगमें किताब का नाम लिखा जावेगा |
संदर्भ: कवि ने मानव जीवन को सुधारने का संदेश देते हुए सांसारिक, गृहस्थों अपना जीवन अपने कर्मों से सुधारने के लिए कहा है |
भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि माया रूपी बिल्ली मनुष्य के ईह लोक अर्थात इस धरती पर और उह मतलब मरने के बाद भी सब कुछ नष्ट कर देगी | मतलब दोनों लोक जीवन और जीवन के बाद भी कोई यश नहीं मिलेगा क्योंकि मोह - माया रूपी बिल्ली के जाल में मनुष्य फँसकर भला - बुरा सब कुछ भूल जाता है, सत्कर्मों को भी नष्ट कर देती है , सभी गलत बातें उसे अधिक आकर्षित करती हैं|
कऔर अधिक लोभ - लालच बढ़ाने पर बाघिन का विकराल रूप धारणा कर लेती है मतलब मनुष्य धरे - ढोरे उससे दराने लगता है ( बाग का नाम सुनते ही सबसे पहले मन में डर का विचार आअतय है इसलिए यहाँ बाघिन को संकेत रूप में लिया गया है) जिसके कारण मोह - माया फंसा मनुष्य भगवान की सत्ता को समझ नहीं पाता , गलत कार्य करते समय भूल जाता है कि भगवान तो सभी जगह है वह हर समय हमें देखता रहता है ( यहाँ बिल्ली को कवि ने इसलिए सांकेतिक रूप में लिया है क्योंक जब बिल्ली दूध पिटी है तो आंखे बंद कर लेती है और समझती है कि उसे कोई नहीं देख रहा वैसे ही मनुष्य भी भगवान को नेही देख पाता )
सब घर फोरि बिलुटा कहायौ, कोई न जाने भेद - जैसे बिल्ली का स्वभाव है कि दबे पाँव से घर - घर घूमती है किसी को पता ही नहीं चलता वैसे ही माया का प्रभाव मनुष्य के पूरे शरीर पर हो जाता है उसे पता ही नहीं चलता और वो नष्ट हो जाता है | उन्हें बर्बादी का कारण ही पता नहीं चलता और समझाने पर समझते भी नहीं है |
खसम निपूतों आंगणि सुतो , रांड न दाई लेव - उसका आँगन सुना है न पति ना ही संतान है , सबसे बुरी बात यह है कि उसका चरित्र इतना बुरा है कि वह किसी को पुत्र भी नहीं बनाने देती है मतलब भगवान का भक्त (सुतो - पुत्र) नहीं बनने देती है| इस प्रकार मनुष्य और उसके घर स्थित भगवान के बीच दीवार बना देती |
पाँच सखी मिली मंगल गावै, यह दुख यकों सालै - पाँच सखी से अर्थ है मनुष्य की पाच ज्ञानेंद्रियाँ भी अपनी इच्छा के अनुसार अपने कर्मों में लागि रहती हैं कयोनी उनको रास्ता ही मोह - माया दिखा रही है ( पाँच विषय हैं - रूप, रस, दृश्य,गंध एर स्पर्श) में आनंद मनाने में लागि रहती है और ये ज्ञानेन्द्रियों का व्यवहार मनुष्य के कष्ट का कारण बनाता है |
विशेषता : मनुष्य का जीवन सफलतम तबही होता है जब वह अपने विवेक से ज्ञानेन्द्रियों का सही उपयोग करके अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को पूरा करता है, अपनी इंद्रियों का दास न बनाकर इंद्रियों को अपने काबू मे रखता है| और जरूरी नहीं है कि सांसारिक जीवन त्यागकर ही भगवान को प्राप्त किया जा सकता है जबकि पननी इंद्रियों को नियंत्रण में रखकर अच्छे कार्य करना भी भगवान को याद करना ही होता है |
शब्दार्थ : बाघिन- शेरनी | संगी - साथी | खसम-पति | पाँच सखी - पाँच इंद्रियाँ |
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