अंधियार ढल कर ही रहेगा -गोपालदास नीरज
अंधियार ढल कर ही रहेगा,आंधियां चाहें उठाओ,
बिजलियां चाहें गिराओ,
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।
भावार्थ:अंधियारा अज्ञानता का प्रतीक है और अज्ञानता रूपी अंधकार मीट जाने पर कितने भी अत्याचार, करो सब का सामना करने और लड़कर उन तूफानरूपी संकटों को हराने का निश्चय कर लिया है, ज्ञानरूपी दीपक जब जला लिया है तो गुलामी रूपी अंधेरा मिट ही जाएगा |
विशेषता: अज्ञानता के अंधेरे में जीवन निराशा में डूबते जाता है किन्तु जब निश्चय कर लिया है तो बड़े से बड़े संकट को हराने भी सफलता मिल सकती है
रोशनी पूंजी नहीं है, जो तिजोरी में समाये,
वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर गाहक लगाये,
वह पसीने की हंसी है, वह शहीदों की उमर है,
जो नया सूरज उगाये जब तड़पकर तिलमिलाये,
उग रही लौ को न टोको,
ज्योति के रथ को न रोको,
यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।
भावार्थ: ज्ञानरूपी दिए से होने वाला प्रकाश कोई धन संपत्ति नहीं है जिसे कोई अपने उपयोग के लिए या भविष्य के लिए तिजोरी या लॉकर में बंद करके रख ले , न ही कोई खिलौना है जिसे हर कोई दाम देकर खरीद ले यह पैसों से खरीदने वाली चीज नहीं है धन नहीं साफ में की आवश्यकता है|
विशेषता: ज्ञान का दीपक जल जाने पर दुनिया कोई शक्ति उसके प्रकाश को नहीं रोक सकती और न ही वह किसी की व्यक्तिगत संपत्ति बन सकती है|
है जवानी तो हवा हर एक घूंघट खोलती है,
टोक दो तो आंधियों की बोलियों में बोलती है,
वह नहीं क़ानून जाने, वह नहीं प्रतिबन्ध माने,
वह पहाड़ों पर बदलियों सी उछलती डोलती है,
जाल चांदी का लपेटो,
खून का सौदा समेटो,
आदमी हर क़ैद से बाहर निकलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।
भावार्थ:कवि ने गुलामी के दिन देखें है और अत्याचारों से भी खूब अच्छी तरह आमना - सामना किया है इसलिए वे कहते हैं कि जब देश के नौजवानों के खून में अत्याचार के विरोध में खून उबलने लगता है तो हवा में भी विद्रोह आ जाता है और उन्हें अगर कोई रोकना चाहता है तो आंधी के समान तेज हो जाते हैं, किसी भी बंधन की चिंता किए बगैर आगे बढ़ते जाते हैं, चांदी रूपी लालच के जाल में फँसाओ या मृत्यु का डर दिखलाओ वे नहीं रुकने वाले हैं क्योंकि ज्ञान रूपी आत्मविश्वास रूपी दीपक जल चुका और हर व्यक्ति अब हर तरह के बंधनों से मुक्त हो कर रहेगा |
विशेषता: जब व्यक्ति स्वयं कुछ निश्चित कर लेती है तो वह दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन जाता है और तब वह किसी के रोकने से नहीं रुकता निडर होकर आगे बढ़ता जाता है
टोक = रोकना, चुनौती
प्रतिबंध= रोक
सौदा = व्यापार
दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,
धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,
दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,
देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,
व्यर्थ है दीवार गढना,लाख लाख किवाड़ जड़ना,
मृतिका के हांथ में अमरित मचलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।
कवि कहते हैं कि दीपक चाहे छोटा हो या बड़ा हो वह उसका प्रकाश सूर्य के प्रकाश के समान ही तेज और अंधेरे को दूर करने वाला होता है, वह दिन में और रात में भी पहरेदार की तरह हमारी रक्षा करता है | दीपक को दूर से देखने से लगता है कि एक फूँक मारकर उसे बुझाया जा सकता है किन्तु उसमें जला देने की उतनी ही ताकत है जितनी कि बड़ी आग में होती है |उस दीपक को दीवारों, दरवाजों मे बंद नहीं किया जा सकता , वह तो अमृत है और मिट्टी मे मिलकर और अधिक खिल जाएगा क्योंकि जब एक बार आत्मविश्वास और ज्ञान का दिया जल गया है तो उसे रोकना और बुझाना संभव नहीं है |
विशेषता:दीपक की ताकत को बताया है कि मन में कुछ करने का हौसला होना चाहिए वह चाहे छोटा हो लेकिन वह सूर्य के समान शक्तिशाली होता है
अवतार= दूसरा रूप
तम= अंधेरा
पहरेदार = रक्षक
विप्लवी= तूफ़ानी
व्यर्थ= बेकार
अंगार= आग
गढ़ना= बनाना
किवाड़= दरवाजे
मृत्तिका= मिट्टी
अमरित= अमृत
वक्त को जिसने नहीं समझा उसे मिटना पड़ा है, बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है,
क्यों न कितनी ही बड़ी हो, क्यों न कितनी ही कठिन हो, हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है,
उस सुबह से सन्धि कर लो, हर किरन की मांग भर लो,
है जगा इन्सान तो मौसम बदलकर ही रहेगा। जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।
भावार्थ: कवि कहते हैं कि अत्याचारी यह नहीं समझते कि समय का यह स्वभाव है कि वह बदलता है और जो यह नहीं समझते उन्हें इस दुनिया में मिटाना पड़ा है, उनका अस्तित्व खतम हुआ है , इसे अत्याचारी अगर तलावर की मार से बच भी गए तो वे अधिक समय तक नहीं बच सकते क्योंकि इसे दपोंक कायर को मरने के लिए अधिक ताकत की नहीं युक्ति की जरूरत होती है और वे फूल के समान नाजुक चीज से भी मारे जाते हैं |
जीवन नदी के समान बहता हुआ आगे बढ़ता है उसके रास्ते में बड़ी से बड़ी चट्टान आए नदी अपने बहाव से उसे हटा देती है या काट देती है वैसे मनुष्य भी जीवन की बड़ी से बड़ी बाधा रुकावट को भी हटा देते हैं |
कवि सभी को संदेश देते हैं कि वह नई सुबह आने वाली है सभी उसका स्वागत करने के लिए तैयार हो जाओ क्योंकि इंसान अब जाग चुका है, अत्याचारों से दो - दो हाथ करने के लिए कमर कस चुका है तो अब दुख का मौसम बदलकर ही रहेगा | आत्मविश्वास का दीपक तो जल चुका है अंधेरा दूर होना निश्चित हो चूका है |
विशेषता: समय की कीमत और स्वभाव को बताया है कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता अगर अत्याचार करोगे तो वही भुगनतने के लिए तैयार रहना चाहिए | उन्हें आत्मविश्वासियों की ताकत पर पूरा भरोसा है |
शब्दार्थ: वक्त=समय
संधि=दोस्ती
किरन =किरण
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