जादू का कालीन - नाटक (1993 प्रकाशित)
मृदुला गर्ग
अंक - 1, दृश्य - 1
कालीन उतना ही अधिक अच्छा माना जाता है जिसमे जितनी अधिक गाँठे होती हैं और इसके लिए 14 वर्ष से काम उम्र के बच्चों को चुना जाता है क्योंकि उनकी पतली नाजुक ऊँगलिया यह काम कर सकती हैं|
बाल मजदूरी एक दुनिया की समस्या है जो विकासशील देशों में बेहद आम है।
माता-पिता या गरीबी रेखा से नीचे के लोग अपने बच्चों की शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर पाते है और जीवन-यापन के लिये भी जरुरी पैसा भी नहीं कमा पाते है। इसी वजह से वो अपने बच्चों को स्कूल भेजने के बजाए कठिन श्रम में शामिल कर लेते है। इसके लिए कानून भी बना है लेकिन चोरी - छुपे बाल मजदूरी कराई जाती है, जिसमे शासन तंत्र और प्रशासन के शामिल होने की घटना का उल्लेख किया है कि 'सुपवाइसर 2 - मंत्री महोदय खुद जानते हैं| लेबर ऑफिसर और मालिक भी बात करते हैं कि कमिसन कैसा कमिसन, मेरे हाथ मे अब कुछ नहीं है|
इस साल सूखा पड़ा, खाने को अनाज नहीं, काम करने के लिए काम नहीं, बारिश आने से सड़कों की टूट - फुट होती थी जिससे सड़क रिपेयर करने के काम में गाँव के लोगों को कुछ काम मिलता था लेकिन सड़कें नहीं टूटी तो मजदूरी भी नहीं है, जंगल में लकड़ी तोड़ने की मनाही, ठेकेदार ने जंगल काटकर साफ कर दिए, गाँव वालों के लिए रिजरब (रिजर्व ) हो गया|
बिन्दुवार सारांश :
- सूखे के कारण गाँव के लोगों की हालत बहुत खराब है |
- बारीउष न होने के कारण फसल नहीं हुई, फसल न होने से अनाज नहीं है, गाँव वाले काम करने को तैयार हैं लेकिन मजदूरी नहीं है |
- बारिश न होने से फसल नहीं हुई जिससे सहर से गाँव तक यातायात नहीं हुआ तो सड़क नहीं टूटी, बारिश नहीं हुई तो सड़क नहीं टूटी तो सड़क नहीं बनेगी उसमें में भी मजदूरी नहीं है |
- जंगल में जाने की मनाही है - रिजर्व हो गया है
- चुनकर लाने तक को लकड़ी जंगल में नहीं है काटने पर fine लगता है
- शहर मे बड़े - बड़े मकान , कारखाने बने हैं जंगल की लकड़ी से और गाँव वालों को मनाही और जुर्माना |
- संतों क पिता रमई और केशों की पिता अपने बच्चों को कालीन कारखाने में मजदूरी करने दलालों के साथ भेज देते हैं और एडवांस में 100 रुपये भी ले लेते हैं |
- संतों का पिता कहता है मेरी लड़की को भी ले जाओ - 90 रु. नहीं तो 80 दे दो| माँ और दादी नहीं भेजना चाहती थी
- अलग - अलग गावों से 6 बच्चे दलाल,कालीन कारखाने में बाल मजदूरी के लिए जाते हैं |
- दलाल बच्चों और गाँव वालों को खूब सपने दिखाते हैं कि डॉलर देश के चावल कोई नहीं खाता वहाँ तो मुर्गा, मछली,मटन खाते हैं |
- संतों की दादी मई और केशों की माँ बच्चों को भेजना नहीं चाहते हैं लेकिन , पिता अपने बच्चों को भेज देते हैं|
- बच्चे नमसमझ हैं वे 'जादू के कालीन' प बैठ कर सपनों को पूरा करने उड जाते हैं |
दृश्य - 2
- बच्चे लगातार काम करते रहते हैं, दो सुपरवाइसर छड़ी लेकर उनके सर पर सवार रहते हैं |
- सूर्योदय से सूर्यास्त तक बच्चों से काम कराया जाता है ताकि आर्डर समय पर पूरा हो सके, उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा पर ध्यान नहीं देते केवल काम की पड़ी रहती है |
- विदेशों में हाथ से बने कालीन की बहुत मांग हैं और सस्ते मजदूर है जिससे फायदा सब उठाते हैं और बच्चों का शोषण होता है |
- अगर गांवों से सस्ते मजदूर ना मिलें तो एक्सपोर्ट चौपट हो जाएगा |
- दिल्ली से डेलीगेशन आने पर बच्चों को स्टोर के ऊपर कमरे छुपा दिया जाता है लेकिन बाल मजदूर लाखन,दूसरे बच्चे शोर मचाकर सबकी पोल खोल देता है |
- समाज - सेविका, पत्रकार बच्चों को बचाते है |
- मालिक सफाई देता है कि लोग खरीदते हैं इसलिए मैं बनवाता हूँ, सबके घर में एसे कालीन बिछे होंगे , सब दोषी हैं |
- समाज सेविका कहती है कि अब एसा नहीं होगा
- पत्रकार कहती है कि सब खत्म हुआ, लेबर ऑफिसर भी तरीफ करता है | * ******************************************
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