नशा - कहानी - मन्नू भण्डारी

 नशा - कहानी - मन्नू भण्डारी 

यह कहानी आनंदी की है जिसकी शादी 10 साल की उम्र में एक विधवा माँ के लाडले और बिगड़े बेटे से हुई थी | जब वह अपने ससुराल में आई थी तो उसकी सास ने घर के चबूतरे ( वरांडे ) पर दिया जलावाया था और कहा था कि 'अपणे सुहाग की मनौती मांग लेना, बहु | रोज इस पर दिया जलाना , घर की यह तुलसी कल्पतरु है |

आनंदी तब सुहाग का मतलब भी नहीं जानती - समझती थी फिर भी उसने सुहाग के मंगल की कामना की थी, रोज दिया जलाने का संकल्प किया था| आनंदी बहुत जल्दी समझ गई की उसकी इस घर में क्या औकात है , खूँटे से बंधी गए - भैंसों से बुरी ! यह सब देख - देख उसे अपने माँ - पिता - चाचा याद आते , रोटी ही रहती उस पर अगर सास आँसू बहाते देख लेती तो तो एसे नोचती कि माँस निकाल आता और किसी काम में कोई कमी रह जाती तो एसे लात मारती कि बेचारी आनंदी मुंह के बाल गिरकर तड़प जाती, एसे अन्याय सहते - सहते आनदी की आवाज ही बंद हो गई बस आँसू बहते रहते | धीरे - धीरे आनंदी यह समझ पाई कि उसकी सास नहीं उसका पति उसके जीवन का आधार है , फिर वह सास के मरने का इंतजार करने लागि कि इसके बाद जीवन में कुछ उजाला आएगा लेकिन क्या जानती थी उसका कर्णाधार पति शंकर उसके जीवन का भार बन गया जिसे उठाते - उठाते उसके कंधे कमजोर होने लगे |

शंकर के पिता नहीं थे माँ ने इकलौते बेटे के दुर्गुणों को कभी देखा नहीं , उसे शराब पीने की लत लग गई, माँ के मर जाने पर शंकर छुट्टा सांड बन गया, जिसमें घर धन , खेत - खलिहान, गए - भैंस  सब कुछ लूटा दिया इससे आनंदी और बच्चों की किस्मत भी फुट गई , दो बच्चे बीमारी में तड़प -तड़प के मर गए , एक बेटा किसनु जिंदा रहा | आनंदी किशनु को छाती से लगाए काम करती रहती | उसके न हाथ रुकते ण आँसू | शंकर या तो सोया पड़ा रहता या नशे में उत्पात  मचाता , आनंदी और किशनु को मारता - पीटता | एक दिन 14 वर्ष के किशनु ने गुस्से में आकर शंकर पर झपटते हुए कहा कि ' कक्का ! माँ को हाथ लगाया तो तुम्हारा खून पी जाऊंगा | आनदी ने बीच - बचाव करके दोनों को अलग किया और उसे अपनी कसं दि कि शंकर पर कभी हाथ नहीं उठाना | उसी दिन किशनु घर से जो निकाला तो 12 वर्ष के बाद लौटा | आनंदी बेचारी बेटे के लिए तड़पती रही | 

किशनु के आने की खुशी में इयतने वर्षों बाद आनंदी ने घर को साफ - सुथरा किया और अपने दुख भरे दिन याद करने कि शंकर ने कैसे - कैसे दुख दिए उसे , दिन - रात खटती रहती और शंकर उससे छिन - झपटकर पैसे ले लेता और शराब पीकर उसे ही मारता, उससे पीछा छुड़ाने के लिए तांबे की कटोरी में रखती थी उसे लाकर डे देती तो वह कहता ' तेरे जसई सती नारी का भगवान का भला भगवान जरूर करेगा आनंदी !तेरा बेटा भी एक दिन जरूर लौटकर आएगा | एसी औरत के साथ तो भगवान भी दुश्मनी नहीं निभा सकता "

शंकर आनदी को बताता है कि देख तेरे बेटे की चिठ्ठी आई है , उसने शहर में कपड़े की दुकान कर लि है बड़ा आदमी बन गया है | खुशी माना तेरा बेटा 12 साल बाद आअ रहा है और इस खुशी में दो रुपये दे | आनंदी किशनु की चिठ्ठी देख बहुत खुश हुई कि हाँ उसके जीवन में भी नया हो रहा है , इतने वर्षों उसने जो चबूतरे की तुलसी पर दिया लगाना छोड़ दिया था वहाँ बैठकर फुट - फुट कर रोने लगी , इतने सालों जो चुपचाप सह रही थी वह ज्वालामुखी के समान फुट पड़ा | इधजर शंकर भी शराब पीकर पूरे गाँव में दौड़ दौड़कर चिल्ला कर सबको किशनु के आने की खुशखबर दे  रहा था | आनंदी चाहती थी कि शंकर उसके पास बैठकर बेटे के आने की खुशी में तैयारी करे लेकिन नहीं उसने आनंदी की तांबे की कटोरी से रुपये लेकर शराब चढ़ा ली थी , आनंदी नहीं चाहती थी कि 12 साल बाद किशनु  शंकर को इस हाल में देखे लेकिन उसके जैसी सरल औरत के लिए शंकर  जैसा शराबी बहुत कठिन था|, आनंदी को तो यह भी बुरा लगा कि किशनु ने चीथती मे अपने पिता के लिए कुछ नहीं लिखा, गुस्सा आज भी उसका वैसा ही है| इसी उधेड़ - बन में थी कि उसका ध्यान तुलसी की ओर गया कि सुख रही है और आज मेरे लिए बड़ा ही खुशी का दिन है और तुलसी में पानी देकर एक दिया जला देती है |

किशनु घर आया और नहाने जाने लगा तो बटुआ माँ को देकर चला गया , इस मौके का फायदा शंकर ने उठाया और आनंदी से 2 रुपये लेकर शराब पीने चला गया | इधर किशनु  नहा - धोकर गाँव में लोगों से मिलकर लौटा तो देखा शंकर नशे में धुत्त बकबक करते चला आअ रहा है | किशनु  माँ को डांटता है कि पैसे देकर क्यों अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारती हो , मैंने तो सोचा था कि पैसे नहीं होंगे तो कक्का सुधार जाएगा लेकिन यह तो वैसा का वैसा ही है | किशनु माँ को चुप कराता है और वह कहती है कि मुझे अपने साथ ले चल|

किशनु माँ को अपने साथ ले जाता है लेकिन आनंदी का आधा मन शंकर के पास ही रह जाता है कि मेरे चले जाने के बाद उसका भला कैसे होगा लेकिन गाँव वाले भी समझा - बुझाकर उसे भेज देते है| लेकिन उसका मन उड़कर शंकर के पास चला जाता| वह आते - आते तांबे की कटोरी में किशनु से मागकर 10 रुपये रख आई थी | किशनु  के घर में आनदी को किसी बात की कमी नहीं थी , बहु भी बहुत ध्यान रखती लेकिन आनंदी का मन नहीं लगता , अड़ोस - पड़ोस की सिलाई - पूराई करने लगी, किशनु  के घर में आनदी को किसी बात की कमी नहीं थी  के मना करने पर छुप - छुप कर करती , बहु - बेटा तो इतना ध्यान रखते कि इतने वर्षों तक उठाए दुख दूर हो गए लेकिन आनंदी का मन नहीं मानता, सिलाई पूराई करते - करते थक गई और एक दिन उसे बुखार आ गया | किशनु  माँ के पास बैठा उसे दवाई पीला रहा था तबही पड़ोस के घर का एक बच्चा आया और आनंदी से बोला " नानी जी, अम्मा ने यह रसि भेजी है पूरे 20 रुपये  भेज दिए हैं और रसीद देकर जाते - जाते बोला अम्मा ने कहा है आपा सब हिसाब बराबर हो गया है |

किशनु को समझते देर न लगी उसने कहा ' अम्मा एसा था तो मुझसे कह देती , मैं भेज देता रुपये , इतना रात - दिन एक करके काम करके बीमार पड़ने की क्या जरूरत थी !"

आनंदी की आँखों से ताप - ताप आँसू बह रहे थे|

विशेषता:  शंकर पिताहीन माँ के लाड़ प्यार में पलकर बिगड़ा हुआ बेटा था, उसे शराब करने का नशा था , नशे में और नशे के लिए उसने पत्नी आनंदी का जीवन नरक बना रखा था | एक तो नशा यह हुआ जो शंकर ने किया |

आनंदी को अच्छाई का नशा था , 10 साल की उम्र में शादी करके आई, सास से कष्ट झेले , नशेड़ी पति की ज़्यादतियाँ सही | लेकिन अपनी अच्छाई को उसने नहीं छोड़ा और न ही अपने इस स्वभाव के लिए किसी दूसरे पर बोझ डालना ठीक समझा इसलिए वह बेटे के घर जाकर उससे नहीं कहती कि अपने कक्का को पैसे भेजे, वह अपने - आप इसकी व्यवस्था कर लेती है |

आनंदी कई विपरीत स्तिथियों अपना जीवन बिताया लेकिन उसने कभी अपनी जिम्मेदाइयों से मुंह नहीं मोड़ा |

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