हानुष - भीष्म सहानी
भीष्म सहानी ने 'हानुष' नाटक के द्वारा हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया और हानुष की रचना के साथ ही हिन्द=ई साहित्य जगत में नाकटकार के रूप में आगमन हुआ | सं 1977 में पहली बार मंच पर हानुष नाटक को खेला गया |'हानुष' नाम का एक कुलफ़साज ( घड़ी बनाने वाला)17 - 18 साल तक बहुत मेहनत करके देश में पहली बार को अनोखी घड़ी बनाता है जिसमें वह अपनी मेहनत का कतरा - कतरा लगा देता है, उसे इनाम के रूप में उस समय का बादशाह दरबारी बनाता है और उसकी आंखे भी निकलवा देता है , जाईआक के पलायन ( चले जाने के बाद) के कारण घड़ी का राज जिंदा रहना इस नाटक ' हानुष' नाटक की मूलहया कथावस्तु है | यह कहानी चकोसलोवाकिया / चैक लोककथा पर आधारित होने के कारण प्रसिद्ध है लेकिन नाटककार भीष्म सहानी ने इसमें काल्पनिक घटनाओं के द्वारा और वैसे ही पात्रों की रचना करके , मधयुगीन परिवेश में कथावस्तु को सजाया है|
'हानुष' नाटक की कथा 3 अंकों में पूरी होती है
नाटक का नायक ' हानुष' है जो एक कुलफ़साज / घड़ीसाज /घड़ीबनाने वाला है ,
हानुष की पत्नी कात्या नायिका है
नाटक के मुख्य पात्र - हानुष का भाई - पादरी
बूढ़ा लोहार
एमिल
यांका
बादशाह सलामत
जैकब
सामाजिक नाटक में पात्रगत, सहज , बोलचाल की उर्दू मिश्रित भाषा का सफल प्रयोग हुआ है |
हानुष एक साधारण घड़ी बनाने वाला होकर भी देश की पहली घड़ी बनाने की धुन में अपनी जवानी के तेरह साल अभावग्रस्त हालत में बीटा देता है | शुरुवात में हानुष की पत्नी कात्या इसी विषय को लेकर हानुष के पादरी भाई के पास शिकायत करती है, उसका इकलौता बेटा ठंढ के दिनों में ठिठुरकर मार जाता है, क्योंकि कमरे को गरम करके रखने के लिए उनके पास ईंधन (जलावन) नहीं होता है ना ही दावा या इलाज कराने के लिए पर्याप्त पैसे होते हैं | इधर हानुष ताले बनाने में लगा रहता है तो कभी कोई काम नहीं कोई काम , कात्या भी शिकायत करती है कि मेरी जवानी भी एसे ही गरीबी में कट गई , हालत एसी है कि कभी - कभी घर मे चूल्हा ही नहीं जलता | पादरी तो कात्या को सलाह देता है कि तुम्हें हानुष का हौसला बढ़ाना चाहिए और इधर हानुष को परिवार की अनदेखी करने को डांटता है और घड़ी न बनाने की चेतावनी देता और बुरी खबर भी सुनाता है कि गिरजे वालों ने (चर्च वालों ) उसे घड़ी बनाने के लिए पैसों की मदत करने से भी माना कर दिया है|
अपनी किस्मत और हालात को देखकर गरीब हानुष घड़ी बनाने का छोड़ देने का फैसला करता है | परंतु बूढ़ा लोहार, एमिल (बेटी),कात्या उसकी हिम्मत बढ़ाते हैं |उसी समय सूअर की चोरी के अपराध की सजा काटकर जैकब , पुलिस और सरकारी अफसर के डर से भागता हुआ यहाँ पहुच जाता है | कात्या उसे अपने घर में रहने को स्थान देती है कि हानुष जैकब को ताले बनाने का काम सिखाएगा और कात्या खुद ताले बेच कर कुछ कमा सकेगी ||जैकब अब हानुष की देखरेख में ताले बनाने लगा
नगरपालिका के सदस्य पाच साल तक हानुष को वजीफा ( कुछ आर्थिक/पैसों की सहायता) देते हैं, बूढ़ा लोहार कमाणियाँ (पतले तार ) , छड़, लीवर, चक्कर आदि घड़ी की चीजें हानुष की आवश्यकतानुसार बनाकर देता और हानुष के सब कामों में जैकब हाथ बढ़ाता था | इस सब के कारण हानुष देश की सबसे पहली घड़ी बनाने में सफल होता है | नगरपालिका के सदस्य योजना बनाकर हानुष को अपने में मिला लेते है, घड़ी पर अपना अधिकार जमा लेते हैं और बादशाह की अनुमति के बिना ही नगरपालिका की मीनार पर लगा लेते हैं| | नगरपालिका की ओर से आयोजित स्वागत - समारोह में महाराज हानुष की घड़ी देखाकर बहुत प्रसन्न होते हैं | योजना के अनुसार नगरपालिका का एक सदस्य , टावर, नया महासू ( शुल्क/कर/टेक्स) लगाने के लिए आवेदन करता है | नगरपालिका का अन्य सदस्य शेवचेक दरबार में सौदागरों - दस्तकारों के आनतः नुमाइंदों की मांग करता है | बादशाह इन दोनों माग पर विचार करने का वादा करते है लेकिन अचानक उनकी परमिशन के बिना नगरपालिका पर घड़ी लगा लेने के लिए अचानक बहुत गुस्सा हो जाते हैं |
हानुष ने चोरी - छुपे घड़ी बनाई और नगरपालिका ने ने सहायता की इन बातों को लेकर बादशाह बहुत नाराज हुए | हानुष ने बादशाह की चापलूसी की गरज से कहा कि - हुजूर यह घड़ी मैंने बनाई है , मैंने इसकी खोज की है, आपकी इस राजधानी की रौनक बढ़ाने के लिए , आपके कदमों पर मई अपनी यह घड़ी समर्पित करना चाहता हूँ |महाराज यह सुनकर बहुत खुश होते है और दरबारी भी देते है , एक हजार सोने की मोहरें देते हैं तथा हर महीने कुछ धनराशि देनी की घोषणा कार्यक्रम में कर देते हैं
तभिनगरपालिका का एक सदस्य, हउसाक महाराज के सामने हानुष की सहायता के लिए 'कुलफ़साजों' ( घड़ी बनाने वालों) को इकट्ठा कर लेता है कि एसी घड़ियाँ बनवाकर देशभर में बेचेने की योजना बनाकर महाराज के सामने रखता है | इस योजना को सुनकर महारज गुस्से मे पागल होकर हानुष को सजा दे देते हैं कि हानुष की दोनों आँखें फोड़ दि जाए , जिससे वह कोई दूसरी घड़ी ना बना सके | माहाराज सोचता है कि अगर एसी ही घड़ियाँ और बन गई तो इस घड़ी का महत्वअ खतम हो जाएगा |
बादशाह का आदेश पूरा किया जाता है और हानुष अंधा दरबारी बनाकर रह जाता है लेकिन उसके घर में अब संपन्नता है, गरीबी दूर हो गई , हानुष का सपना की वह एक अनोखी घड़ी बनाएगा यह सपना भी पूरा हो गया | लेकिन हानुष अंदर ही अंदर घुट घुटकर जी रहा था | उसका आहात मन उस घड़ी को तीन बार तोड़ने की कोशिश करता है कि इस घड़ी के कारण वह अपना जीवन ठीक से, खुशी से जी नहीं पाया , बीवी - बच्चों को सुख नहीं डे पाया और यह हासिल करके उसे और अधिक दुख भोगना पद रहा है फिर भी जब भी वह घड़ी की आवाज सुनता तो बेचैन हो उठता था | उसकी मानसिक हालत पागलों के जैसी हो गई थी | हानुष की यह हालत देखाकर उसका दोस्त, एमिली, पत्नी कात्या सलाह देता है कि तुला राज्य में चोरी - छुपे जाकर बस जाए | लेकिन कात्या को यह विचार सही नहीं लगता है | तबही हानुष बादशाह की सवारी से टकराकर घायल हो जाता है| वह एसा जानबूझकर करता है , वह मार जाना चाहता है लेकिन घायल होकर रह जाता है तब कात्या को एमिल की बात सही लगती है और मजबूरी में वह तैयार हो जाति है | एमिल जैकब को तुला के सौदागर जोरजी से मिलने भेज देता है |
हानुष का जीवन बहुत ही असत - व्यस्त हो गया था एक ऑरतों वह घड़ी को तोड़ देनाहता था तो कभी बादशाह की गाड़ी के आगे गिरकर मार जाना चाहता था तो कभी घड़ी की आवाज सुनकर बेचाई हो जाता तो कभी घड़ी ठीक से न चलाने को लेकर पड़ेशान हो जाता था |गली में लोग बाते करने लगते हैं कि हानुष की घड़ी बंद हो गई है| बड़े वजीर (मंत्री) के आदेश के अनुसार दो सिपाही हानुष घड़ी की मरम्मत करने के लिए ले जाते हैं , वह घड़ी के लीवर को छूटे ही रोमांचित हो जाता है, लोहार का काम जानने वाले सहायक से अपनी प्रसंक्षा सुनक हानुष खुश हो जाता तथा उसे लगता है कि हाँ 'यह मेरी घड़ी है' इस सोच के साथ घड़ी सुधारने में जुट जाता है, हानुष को चाहने वाला बूढ़ा लोहार नया लीवर बनाकर देता है | हानुष ने घड़ी को सुधार कर चला दिया | उसी समय सरकारी अधिकारी उसे यह कहकर पकड़ लेते हैं कि महाराज के माना करने के बाद भी एक और घड़ी बनाने और चोरी - छुपे दूसरे देश भाग जाने की योजना बना रहा है आनुष बेचारा पकड़ा जाता है लेकिन जैकब सफलतापूर्वक भाग जाता है | हनुष तो कुछ कर नहीं पाता लेकिन जैकब के भाग जाने से घड़ी बनाने का राज जिंदा रहता है यही सोचकर हानुष महाराज के पास जाने को तैयार हो जाता है |
इस प्रकारहम देखते हैं कि यह हानुष के संघर्ष की यातना, सफलता, असफलता की कहानी है कि अपना सपना सपना सच करना इतना कठिन था लेकिन बहुत कठिनाइयों से पूरा करने के बाद उसे पुरस्कार के रूप में कड़ी सजा मिली लेकिन हानुष की रचनाधार्मिता पाठकों के लिए सदैव प्रसंशा के योग्य है || एक तरफ देश के लिए अनोखी घड़ी बनाने की तीव्र इच्छा , इसके लएए गरीबी , पारिवारिक विपपन्नता - संघर्ष ,तिरस्कार, अवमानना और उपेक्षा का दंश तो दूसरी तरफ सृजन की प्रबल भावना है |
विशेषता: यह नाटक अपने काल का सही रूप दिखाता है जब राजा सबसे बड़ा माना जाता था , राजसत्ता और धर्मसत्ता के आगे सभी को झुकना पड़ता है | राजसत्ता, धर्मसत्ता और व्यापारी वर्ग की नीति दिखाई है , सामान्य लोग बड़ी आसानी से कुचल दिए जाते हैं | इस नाटक में एक सामान्य कलाकार की विजय और पराजय बहुत ही मार्मिकता से दिखाया है | जैकब का सफलता पूर्वक भाग जाना ही हानुष की सच्ची सफलता है |
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