कोर्ट मार्शल - स्वदेश दीपक
स्वदेश दीपक आधुनिक युग के प्रसिद्ध नाटककार हैं। उनका नाटक कोर्ट मार्शल हमारी समकालीन व्यवस्था के प्रति तीखा आक्रोश व्यक्त करने वाला नाटक है। प्रस्तुत नाटक में दलित चेतना उभरकर सामने आयी है। नाटककार स्वदेश दीपक इस नाटक के माध्यम से दलित चेतना को व्यक्त करने में सफल रहे हैं। हमारी प्रजातंत्रीय व्यवस्था, न्याय स्वातंत्र्य की नीव पर खड़ी है, संविधान में सभी को समान अधिकार दिये गये हैं। परन्तु उच्च वर्ग अपने आपको श्रेष्ठ समझने लगा और निम्न वर्ग का शोषण करने लगा। निम्न वर्ग को सम्मानित जीवन पाने का अधिकार केवल संविधान के कागजों में सुरक्षित है।
कोर्ट मार्शल एकाँकी हमारी सामाजिक व्यवस्था में छिपी गंदगी को उजागर करता है। हमारे देश में कानून नियम अनुशासन तथा व्यवस्था की गोद में निम्न वर्ग का निर्मम शोषण किया जाता है। इस नाटक में रामचन्दर एक निम्नवर्गीय जवान (सवार) का कोर्ट मार्शल किया जाता है। नाटक में उसने एक जघन्य अपराध किया, उसका अपराध यह है कि दस जून की रात को जवान रामचन्दर गार्ड ड्यूटी पर था। रात के नौ बजे रेजिमेंट के दो अफसर कैप्टन मोहन वर्मा और कैप्टन कपूर साईकल पर गार्ड चोकी के पास से गुजरे। जवान रामचन्दर ने सरकारी राइफल से उन पर गोली चला दी। कैप्टन मोहन वर्मा की हादसे की जगह पर ही मौत हो गई। कैप्टन कपूर गंभीर रूप से घायल हो गये। कैप्टन कपूर बच गया क्योंकि गोली उसके बाएँ कंधे के पास लगी थी। इसका मतलब है कि जवान रामचन्दर इन दोनों अफसरों का कत्ल करने का पक्का इरादा कर चुका था। इंडियन आर्मी एक्ट 69 और इंडियन पेनल कोड को दफा 302 के तहत जवान रामचन्दर का जनरल कोर्ट मार्शल किया जा रहा है। जानबूझकर होशो-हवास में मर्डर करने, कत्ल करने पर कोर्ट मार्शल। इस कोर्ट मार्शल के प्रोसेसिंग आफीसर कर्नल सूरतसिंह है, जिनके हाथ से आज तक काई मुजरिम नहीं बच पाया है। साथ ही गवाह के तौर पर उपस्थित व्यक्तियों को देखते हुए रामचंदर के बच निकलने का कोई चान्स नहीं है। केवल एक कारण से रामचन्दर बच सकता है। वह है पासवर्ड पूछने का। अगर कोई उसे पासवर्ड पूछकर अन्दर न आये तो वह आर्मी लॉ के मुताबिक उसे गोलीमार सकता है। लेकिन रामचन्दर इस प्रकार
अपना बचाव नहीं करता है। क्रॉस एक्ज़ामिशन के द्वारा सच्चाई सामने आती है। इस सच्चाई से पता चलता है कि रामचन्दर निम्न जाति के दलित होने के कारण बार-बार प्रताड़ित किया जाता है। कैप्टन कपूर और कैप्टन मोहन वर्मा उच्चवर्गीय हैं और रामचन्दर को अपमानित करने का कोर्ट मौका नहीं छोड़ते हैं। कैप्टन कपूर तो यहाँ तक कहते हैं- अब खानदानी लोग फौज में भर्ती नहीं होते। नीची जाति के लोगों की भर्ती किया जाएगा तो यही होगा।… भूखे… नंगों को जब फौज में भर्ती किया जाए, भरपेट रोटी मिलने लगे तो उनका दिमाग फिरेगा कि नहीं। इस प्रकार नाटक में रामचन्दर को दलित होने के कारण मानसिक रूप से उत्पीड़ित किया जाता है। कैप्टन वर्मा उसे चूहड़ा भंगी कह कर पुकारते गाली देते एक ईमानदार फौजी को निजी नौकर की तरह प्रयोग करते – बलवान सिंह कहता भी है। रामचन्दर ने साहब की बच्ची का टट्टी उठाने से इन्कार कर दिया। कैप्टन कपूर ने सब मेहमानों के सामने उससे कहा- जात का चूहड़ा और टट्टी उठाने में शर्म आती है। तुम्हारे पुरखे पुश्तों से हम लोगों की टट्टी की टोकरी उठा रहे हैं।
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इस प्रकार बार-बार प्रताड़ित रामचन्दर अपना मानसिक संतुलन खो देता है। कैप्टन वर्मा तो उसे यहाँ तक कहते हैं- चिट्ठे चूहड़े। हराम की सट्ट! तेरी माँ जरूर किसी कपूर या वर्मा के साथ सोयी होगी। इस तरह प्रताड़ित होने पर रामचन्दर अपने बड़ों से इसकी शिकायत करता है लेकिन वे भी उसकी शिकायत नजरअंदाज करते हैं। और यही हमेशा होता आया है छोटे आदमी की शिकायत को वहीं दबाया जाता है और बड़े लोगों की गलती को देखकर भी आँखें बन्द कर दी जाती है। सदा से ही सवर्णसमाज को लगता है कि दलित हमारे अन्याय को सहन करें और मुँह से आवाज भी न निकाले।
दलित व्यक्ति अपनी योग्यता के बल पर कितनी भी उन्नति कर ले लेकिन सवर्ण समाज उसे अच्छे नज़रों से नहीं देखता जैसे कि जब रामचन्दर कैप्टन कपूर से दौड़ने में तेज है तो कैप्टन कपूर उसके बारे में कहता है कि- रामचन्दर गाँव में डंगर चराता था। सारा दिन जानवरों के पीछे दौड़ता होगा। मुझे दौड़ में हराकर वह सुपरमैन तो नहीं बन गया। कैप्टन कपूर हर वक्त रामचन्दर को छोटे लोग कहता था। धीरे-धीरे कैप्टन कपूर के चरित्र की सारी
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कमीनी परतें उघड़ती चली जाती हैं। रेजिमेंट के रेजिंग डे पर रामचंदर पांच हजार मीटर की दौड़ में अव्वल आता है। सीओ रावत उसकी टाइमिंग देखकर दंग रह जाता है। सेना के रिकार्ड से सिर्फ 20 सेंकिंड ज्यादा। सीओ को यकीन हो जाता है कि रामचंदर यह रिकार्ड तोड़ सकता है। इसलिए वह दूध और बादाम की रामचंदर की एकस्ट्रा खुराक लगा देता है। बाद में वह 5 हजार मीटर दौड़ के पूर्व चैंपियन कैप्टन कपूर के रिकार्ड को तोड़ता भी है। यही कैप्टन कपूर से सहन नहीं होता। कैप्टन कपूर के आदेश के मुताबिक सूबेदार बलवान सिंह सीओ से पूछे बिना रामचंदर को कैप्टन कपूर का अर्दली लगा देता है। सूबेदार बलवान सिंह कैप्टन बिकाश राय की दलीलों से चौतरफा घिरने पर कुबूल करता है कि रामचंदर चूंकि छोटी जाति का है इसलिए कैप्टन सबके सामने उसे अपमानित करता है। उसको अपनी दुश्मनी की भी काबिल नहीं समझता था। कैप्टन कपूर का रामचन्दर को दुत्कारना अपमानित करना उसके दिल पर ज़ख्म कर गया था। रामचन्दर का नाम भगवान रामचंदर के नाम पर होने पर भी उच्चवर्गीय कैप्टन वर्मा और कपूर जैसे लोगों को एतराज होता है।
नाटककार ने रामचन्दर के माध्यम से किसी भी क्षेत्र में दलितों के ऊपर हो रहे अत्याचार को उजागर किया है। रामचन्दर इतना बड़ा गुनाह खुद नहीं करता बल्कि उसे यह जुर्म करने के लिए तथाकथित सवर्ण समाज के अफसर बाध्य करते हैं। सवर्णों की नजर में दलित समाज का कोई भी व्यक्ति उनसे ऊँचा नहीं उठ सकता अगर कोई ऐसा करता भी है तो उसे हर वक्त कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।
साहित्य समाज का दर्पण होता है। उसमें समाज जीवन व्यवस्था सामाजिक समस्याओं पर विकल्प की खोज और विचार विमर्श निरंतर होते रहे हैं। समाज में घटित अमानवीय व्यवहार का चित्रण भी साहित्य में होता रहा है। ठीक इसी तरह कोर्ट मार्शल नाटक में अमानवीय व्यवहार का चित्रण एक ईमानदार भारतीय सैनिक के साथ होता है और उसे मौत की सजा मिलती है और यही उसकी इर्मानदारी का पुरस्कार है और ऐसा पुरस्कार सिर्फ दलितों को ही मिल सकता है सवर्ण को नहीं।
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स्वदेश दीपक का कोर्ट मार्शल नाटक हमारी समकालीन व्यवस्था के प्रत्येक पहलू में छिपे उन चेहरों का पर्दाफाश करता है जो कानून नियम अनुशासन तथा व्यवस्था की विसंगति पर करारा व्यंग्य है।जैसे-जैसे कातिल सवार रामचंदर का कोर्ट मार्शल तेजी पकड़ता है, बचाव वकील कैप्टन विकास राय की हाजिर जवाबी और तथ्यपरक दलीलों की वजह से ऐसा प्रतीत होता है जैसे ट्रायल सूबेदार बलवान सिंह, ले. कर्नल ब्रजेन्द्र रावत का चल रहा हो और सरकारी वकील मेजर पुरी के झूठ का पुलिन्दा रेत की दीवार की तरह गिरता चला जाता है तथा ऐसा प्रतीत होने लगता है कि कोर्ट मार्शल कातिल सवार रामचंदर का नहीं, कैप्टन कपूर का हो रहा हो। कैप्टन विकास राय स्वयं को आत्मा का अहेरी ( शिकारी ) कहता है। वह सचमुच आत्मा का अहेरी है भी, किसी भी कोने में बैठे पाप का आखेट ( शिकार ) करता है। इसके साथ ही साथ भारतीय समाज का कोढ कहलाने वाली जाति और वर्णव्यवस्था के प्रति तीखा आक्रोश भी व्यक्त करता है। दलितों के गुस्से को दृढ़ता के साथ स्वदेश दीपक ने पकड़ा है,सही रूप में दलित चेतना की अभिव्यक्ति कोर्ट मार्शल में हुई है। कोर्ट मार्शल की पीड़ा भौतिक स्तर के उत्पीड़न की पीड़ा मात्र नहीं है बल्कि वह रामचन्दर की मानसिक और मनोवैज्ञानिक निराशा की पीड़ा है। नाटककार ने रामचन्दर को व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करने वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है।
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विशेषता: नाटक का अंत पाठक की चेतना को स्तब्ध कर देता है। रामचंदर का यह अकेला संवाद पूरे कोर्ट मार्शल की दिशा बदल देता है। जब वह कैप्टन बिकाश राय के पूछने पर चीखते हुए बताता है कि कैप्टन कपूर और कैप्टन वर्मा उसे कैसी-कैसी गंदी गालियां देते थे। जब रामचन्दर की जगह कैप्टन कपूर कोर्ट मार्शल के कटघरे में खड़ा नजर आता है और गार्ड से लेकर सभापतिजन, सूरत सिंह तक की आंखों में कैप्टन कपूर के लिए सिर्फ घृणा, अकूत घृणा ही दिखाई देती है। सभापति कैप्टन कपूर के बंधे हुए हाथ को घूरते हुए उसकी यह पंक्तियां पूछती हैं कि असली मुजरिम तो कैप्टन कपूर है, रामचन्दर नहीं। दलित विमर्श का ऐसा क्रूरतम रूप हिन्दी के किसी नाटक में शायद ही उद्घाटित हुआ हो। निर्विवाद रूप से यह नाटक दलित विमर्श के
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एक सशक्त दस्तावेज है कि किस प्रकार जातिवादी एवं सामंतवादी सोच निम्न वर्ग के प्रताड़ित लोगों का जीना मुहाल कर देती है। परिस्थितियां जब बर्दाश्त से बाहर होती प्रोसीडिंग ऑफिसर एवं अन्य सलाहकार जज पूरा मामला सुनने के बाद रामचंदर के प्रति सहानुभूति रखते हैं, लेकिन फांसी की सजा भी सुना देते हैं। अंत में यह सवाल छोड़ जाता है कि जातिवाद एवं सामंतवादी सोच हर जगह आज भी विद्यमान है, जो
समाज और व्यवस्था को खोखला कर रही हैं। लंबी कोशिशों के बाद जब हत्या का आरोपी सैनिक रामचंदर बोलता है तो पता लगता है कि अधिकारी द्वारा लगातार प्रताड़ित करने एवं अंत में उसकी मां के खिलाफ द्वेषभावना के चलते गलत शब्दों के प्रयोग से क्षुब्ध होकर सैनिक हत्या करने के लिए बाध्य हो जाता है। सिपाही रामचंदर अपने ही अधिकारी की गोली मारकर हत्या कर देता है।
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धन्यवाद
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