जमुना के तीरे - तीरे ------------------------------------------------- आना पड़ता है |
जमुना के तीरे - तीरे का अर्थ है यमुना नदी के किनारे - किनारे , लेखक ने इस शीर्षक और निबंध से यह संदेश दिया है कि जीवन जीने के लिए , अपना कैरियर बनाने के लिए जिंदगी कई अवसर देती है , मन में इचचहए बहुत होती है लेकिन अपनी योग्यता का पता नहीं होता है | लेखक यमुना नदी के आस - पास के जन्मे, पाले - बढ़े इसलिए यमुना नदी का उदाहरण देकर वे लिखते हैं कि यमुना नदी का पानी तैरने के लिए अपनी ओर खींच रहा है लेकिन नदी की गहराई से घबरा जाता हूँ , जैसे जीवन में बहुत कुछ आकर्षक लगता त है लेकिन अपनी योग्यता और संसार की विशालता का पता नहीं है जिससे आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं ओटी और मैं वहीं अपने गाँव के आस - पास यमुना नदी के किनारहई अपना जीवन देखता हूँ |
लेकिन यहाँ भी जीवन इतना आसान नहीं है जिसका मतलब है कि जीवन में अपने सोचे या चाहे अनुसार सब कुछ नहीं मिलता है | इसी सोच - विचार से जमुना के किनारे रहा लेकिन वहाँ पर भी कभी कोई अच्छा (सीघाट ) स्थान मिला , कभी कोई छोटा सहारा मिला तो उसे पकड़कर आगे बढ़ता रहा और कोई खटारा उठाए बिना वापस आअ जाता, दूसरी तरफ कांटे दार बाबुल का पेड़ मतलब कठिनाई रूपी कांटे, तो कहीं करील के कुंज मतलब काँटों का वन ही मिल जाता है, कभी के नीरस घाँस - पूस तो कहीं रेती में चिलचिलाती धूप जिसका अर्थ है की हारों ओर से परेशानी ही परेशानी ही है | साथ ही अगर धीरज रखकर आगे बढ़ो तो उसी काटेदार बबूल से हल्की सुगंध आती है , जिसका मतलब है कि जीवन के रास्ते की कठिनाइयों से ठीक से सामना कर लेने पर वह परेशानी, परेशानी नहीं लगती है , पलाश के फूल जो लाल चटकीले रंग के होते हैं जिनमें कोई सुगंध तो नहीं होती लेकिन उसका रंग मोतिवेत करता है , बेकार घाँस - पूस की हरियाली मन को, आँखों को ठंठक देती है | इतना ही नहीं कठिन रास्तों पर चलाने से ही काँटों के वन में सलिल (पानी) सरस्वती नदी के पानी के बहने का संगीत सुनाई देती है और अमृत बरसाने वाले बादलों का राग सुनाई देता है , इसका अर्थ है कि जीवन में अगर आगे बढ़ाना है तो कठिनाइयों का सामना दांत कर करना पड़ता है तब ही काँटों की चुभन नहीं लगती और बबूल से भी सुगंध आती है | लेकिन कुछ पाने के लिए छूछा छोड़ना भी पड़ता है अगर तरक्की करते हो तो जमीन से जुड़ी चीजों से दूर हो जाओगे , वाहों गांवों के खेतों में झूमती पकी गेहूं की फसल देखने नहीं मिलेगी ना ही खेतों में उगाने वाले मटर के चमकदार दाने जो नांक में पहने वाले गहने से दिखते हैं नहीं मिलेंगे, ण ही नदी के किनारे पेड़ के निचहे की ठंठी छनव का मजा लूट पाओगे | इतना सब सोच - समझकर, अनुभव करके यही लगता है कि जमुना का किनारा ही अच्छा है |
तीरे - तीरे = किनारे - किनारे, तट पर
सुघाट = अच्छा सा घाट, किनारा
डेंगी = टोकनी जैसी छोटी सी नांव
थामे = पकड़कर
बाबुल की छाँह = यह एक छोटा सा पेड़ होता है जो काँटों से भरा होता है और पत्तियां इतनी छोटी होती है कि इसकी छाँह भी खास नहीं मिलती और यह पेड़ काँटों के लिए ही जाना जाता है |
करील = काँटों का पौधा होता है, इसमें फल लगते है तो कोई पत्तियां नहीं रहती हैं, फल को जहरीला काहा जाता है |
कुश परास = घाँस - पूस
रेती बालू, sand
चिलचिलाती धूप = बहुत तेज धूप
पलाश = होली के फूल भी कहते हैं , इसमे कोई गंध नहीं रहती
अमिय बरसाने = अमृत बरसाने
अनाहत = लगातार, बिना रुकावट के
नाद = संगीत
नकबेसर = महिलाओं के नांक में पहनने वाला गहना
कचनार = कई रंगों के फूल देने वाला वृक्ष है जो ज्यादातर गांवों में ही देखा सकते हैं |
सघन = घना
वंशिवट = बरगद का वृक्ष जिसके नीचे कृष्ण जी वंशी बजाते थे |
भले याद आई ---------------------------------------- प्रदान किया है |
मुझे इसकी भी अछि याद आई कि इस किनारे पर गंगा - यमुना नदी बिछ की जमीन भी मिलती है और वह इतनी अधिक उपजाऊ है कि धरती की छाती फाड़कर उपज देती है, आस - पास के आयामों के खेत फलों से लड़ जाते हैं| यह वह पवित्र स्थान है जहां काव्य रचना करने वाले महान कवि तुलसीदास ने ' राम भक्ति' देवताओं की नादिन की तरह धरती पर बहाया था, औ ब्रम्हा के विचार को सरस्व नदी के समान विशाल रूप दिया था|
करम कथा रविनंदिनी बारानी ।
बिधी निषेधमय कलिमय हरनी ||
भावार्थ:-विधि और निषेध (यह करो और यह न करो) रूपी कर्मों की कथा कलियुग के पापों को हरने वाली सूर्यतनया यमुनाजी हैं और भगवान विष्णु और शंकरजी की कथाएँ त्रिवेणी रूप से सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनंद और कल्याणों को देने वाली हैं |
उआपर दिए दोहे का अर्थ बहुत गूढ है कि कर्म का जो काला रूप है उसमें अपने काला नहीं करना है बल्कि अपना व्यक्तित्व उसी तरह साफ रखना है जैसे यमुना नदी का पानी काला होकर भी पानी का धर्म नहीं छोड़ता, केवल पाप - पुण्य, सुख - दुख, बीर - भाव से अपने को ऊंचा उठाना ही कर्मयोगी है |कलिमल हरनी से मतलब है कि करममार्ग में आने वाले सनकों का सामना करना क्योंकि यमुना नदी गहरी है , उथली नहीं है वैसे ही जीवन का मार्ग है कि गहरे जाकर समझो और आगे बढ़ो| नहीं तो जीवन नदी के किनारे अभावों में बीत जाएगा , अभ्यास की जरूरत है, ऊपर से पानी काला दिखाता है लेकिन उतारने पर जमुना के पानी में शीतल प्रकाश है |
लेखक कहते हैं कि मैं बहुत समय से जमुना की धार पकड़कर चल रहा हूँ , बीच - बीच में कुछ दूसरी आवाज सुनाई दी और मैं उसके पीछे भटक भी चुका हूँ लेकिन वह आवाज अपने आप ही कहीं खो गई || कई बार कोशिश करने और अपने ज्ञान पर घामड़ करने पर भी किस्मत चमकती नहीं क्योंकि जो भाग्य में किलहा है उससे ज्यादा तो मिल नहीं सकता, भगवान से आगे हम नहीं बढ़ सकते |
लेखक कहते हैं कि अधूरा ज्ञान बहुत बड़ा अभिशाप है, मैं अगर अपने आप को देखता हूँ तो लगता है मैं आगे नहीं बढ़ा मेरे नीचे की धरती आगे निकाल गई है , मैं तो वहीं का वाहन हूँ |रेतीली सरस्वती जिसे लेखक ने अधूरे ज्ञान की बात कही है कि इसी के कारण तरक्की धीरे हो जाति है और मन दुखी हो जाता है , जो निराशा, हीनता, ग्लानि,अनुताप और उदासी को जन्म देकर जीवन कठिन बना देता है, कोशिश आगे बढ़ने की करते हैं लेकिन मन पीछे किसी कचहर के बुरे स्वप्न में उलझा रहता है | न आगे बढ़ाने देता है ना ही पीछे जाने देता है और असफलता की भावना पनपती रहती है |
जीवन में कुछ मोड सामने एसे खड़े हो जाते हैन जो मन छीलते रहते हैं, बचपन में किसी ने कहा था कि मैं जज बनाने की इच्छा रखता था , सही में तो जज नहीं बन पाया लेकिन मन के भावों को जज बन गया जिससे मै खुद ही अलझा रहने लगा और इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि कर्म पाठ पर मनुष्य कॉकहुड़ के ज्ञान से ज्यादा खतरा है, जब मनुष्य अपने - आप को सबसे बड़ा ज्ञानी मान लेता है |
आज हम बुद्धिवाद के युग में हैं और ज्ञान को खतरा बोलना ! लेकिन यह सही क्योंकि कि इस युग में लोग अंधी दौड़ में भागे जा रहे हैं , जो सीधे रास्ते चलते हैं पीछे रह जाते हैं , जो नियम , कायदे तोड़कर भागते हैं सबसे आगे पहुँच जाते हैं, विवेक से किए काम का महत्व केवल विवेक तक है उसे कोई नहीं पूछता | व्यवहार बुद्धि का अर्थ है " काइनयानपन" जो उचित - अनुचित का ख्याल नहीं रखता सिर्फ फायदा का द्यान रखता है |
धूर्तता के कारण ही मनुष्य आगे बढ़ता गया है , धूर्तता से ही शक्तिशाली प्राणियों को भी हराया है और सबसे शक्तिशाली बन गया है, सीधे - सादे - सच्चे व्यक्ति, जाति, समौड़ाए की जातियाँ खत्म हो गई हैं| प्रश्न यह उठता है कि सफल होने के लिए धुरता सीखना चाहिए? साध्य बड़ा या साधन ? सिद्धि बड़ी या साधना ? सागर बड़ा या नदी? हर काल में इन प्रश्नों के उत्तर जाने का प्रयास हुआ लेकिन हर काल में यह अनुत्तर ही रह गए | मई तो सीधी सी बात जानता हूँ कि मैंने तो जमुना की धार में अपने को बहा दिया जिसमें कुछ साथ बहकर आगे निकल गए, कुछ बहकर गंदी नालियों में खो गए , कुछ साथी उन्हीं की संगत में नीचे चले गए, कर्मपथ पर आगे बढ़ाने के स्थान पर नीचे गिर जाना ही पसंद किया लेकिन मैं तो जमुना की धार में उसके बहाव के साथ बहता रहा |
माना जाता है कि यमुना और यमराज का भाई बहन का नाता है, शुभ - अशुभ दोनों साथ चलते हैं वैसे ही जैसे जीवन में सुख - दुख आटे - जाते रहते हैं | नदी की धार में उलटी दिशा में बहाने वाली हवा कभी तो नाव को पलटकर पानी में डुबो दे , लेकिन अपनी नाव को कसकर पकड़कर रखने के कारण डूब नहीं पाया , और जो आमंत्रण मिला था वह इतना प्रेम पूर्ण था कि उलटी हवा के झोंके फूल के समान नाजुक लगे |
सुना है कि अगर पूरे विश्वास और श्रद्धा से कोई उसमें उतार जाए तो हाथ - पैर चलाने की भी जरूरत नहीं है वह धारा ही सम्हाल लेती है लेकिन उसमे एक बार उआतरना ही कठिन है , जो अपनी जान का मोह और डर छोड़कर उतरे वह धारा उसी की है |उस धारा में कूदने वाला स्वयं नाव बन जाएगा , उसे ले जाने के लिए दूसरी नाव की जरूरत ही नहीं है |
अंत लेखक कहते हैं कि मैं तो स्वयं को धारा को समर्पित करके उसमें बहते रहने वाला हूँ , धारा मुझे जहां चाहे ले जाए , चाहे उसके किनारों पर कांटे ही कांटे क्यों ना हो ,भले ही यमुना में लहरदार तरंगे ना हो , मुजही उसका काला रंग ही अच्छा लगता है, मई अपने सीधेपन से खुश हूँ, मुझे धूर्त बनाकर बुद्धिवादी बनाने का शौक नहीं है | मैं जमुना के किनारे पर चलता रहूँगा, मेरे क्रम बना हुआ है , मई इससे बहुत खुश हूँ कि अपनी योग्यता का ज्ञान है मुझे, मई अंधी दौड़ में भागना नहीं चाहता, जमुना के तीरे - तीरे चलना मुझे अपने लिए ठीक लगता है |
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें