Jagat Pravaah-Balkrushn Bhatt जगत प्रवाह-बालकृष्ण भट्ट-Nibandh-Summary

जगत प्रवाह-बालकृष्ण भट्ट

-Nibandh-Summary

 Jagat Pravaah-Balkrushn Bhatt

  • Summary: जगत प्रवाह निबंध में भावों और विचारों के साथ लेखक की दूरदर्शिता अनुपम है|अपने समय में अपने आस पास के लोगों की मानसिकता स्तिथि परिसतिथि से चिंतित होकर लेखक ने यह निबंध लिखा है इस समय हर कोई आगे बढ़ने , पैसे कमाने की होड में अंधी दौड़ में भागे जा रहा है |
  • इस बुद्धिवादी युग ने बहुत सारी उपलब्धि प्राप्त कर ली है, इतनी कि समुद्र - नदियों का पानी भी उल्टा बहा सकते हैं लेकिन संसार के बहाव को रोक नहीं सकते|
  • मानव - जीवन के लिए केवल सफलता काफी नहीं बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किस रास्ते से सफलता प्राप्त की है |
  • जगत - प्रवाह का अर्थ है दुनिया का बहाव | दुनिया आगे ही बढ़ती जा रही है और समय के साथ सभी को आगे ही बढ़ते जाना है | चाहे अवतारी हों, ज्ञानी, शक्तिशाली हो कोई भी इससे बच नहीं पाया है |
  • आज सफलता की दुनिया में जीतने भी उपलब्धियां प्राप्त कर रहे हैं उसके पीछे पैसा,नाम , यश कमाने की इच्छा ने ही सफलता की पवित्रता को चोट पहुंचाया है |
  • पैसा कमाने के इरादे से किए काम में ईमानदारी नहीं रहती,रुपये - धन कमाने का लालच ही व्यक्ति को स्वार्थी बनाता है और आज हम देख रहे हैं कि धन - संपत्ति के लिए भाई - भाई के खून का प्यासा हो गया है |
  • जैसे - जैसे आप जीवन और जगत की सच्चाई को जानने - समझने की कोशिश करेंगे तो समझ में आएगा कि यह हमारी आवश्यकता नहीं है , यह हमें नहीं चाहिए |
  • धन से नरम बिस्तर खरीद सकते हैं लेकिन नींद नहीं खरीद सकते यह जानना समझना बहुत जरूरी है |
  • जगत - प्रवाह सिर्फ आगे बढ़ना ही नहीं बल्कि अपनेआप पर भी ध्यान देना जरूरी है क्योंकि आज का दिन आने वाले कल में इतिहास बन जाएगा इसलिए अपना इतिहास अच्छा बनाने का विचार हमेशा रहना चाहिए |
  • लेखक ने चरित्र और स्वभाव को समझाने के लिए अपने मित्र वृंदावन का उदाहरण दिया है कि एक व्यक्ति को जिसका नाम सिद्धार्थक है उसे अपने मित्र वृंदावन के पास भेजते हैं|
  • वैसे तो वृंदावन बहुत बुद्धिमान है लेकिन वह भी सिद्धार्थक की बातों पर मोहित हो गया था, दोनों एक साथ गाड़ी में सवार होकर अपने ठिकाने पर पहुंचते हैं तो सिद्धार्थक के लिए व्यवस्था करने लिए वृंदावन अपने नौकर को कहकर भीतर चले जाते हैं |
  • नौकरों की आदत होती है कि मालिक की नजर बचाकर जिम्मेदारियों से बचते रहते हैं और जब पकड़े जाते हैं तो शांति - शांति कहते हैं लेकिन जानबूझ कर किए गलत कार्य करने के बाद शांति कहाँ मिलती है |
  • साफ शब्दों में कह सकते हैं कि अगर कांटे बोओगे तो फूल कहाँ से मिलेगा इसीलिए जीवन प्रवाह में सचेत रहना चाहिए |
  • इस बात की सत्यता हर काल में सिद्ध हुआ है चाहे राम, युधिष्ठिर हो या आधुनिक काल टाटा,दारा शिकोंह हो या सिकंदर हो कोई दुनिया के प्रवाह से बच नहीं पाया है |
  • जब संसार रूपी प्रवाह में बह ही जाना है तो बेमानी, चोरी , षडयन्त्र आदि क्यों करें |
  • यह तो यूनिवर्सल नियम है कि जगत के प्रवाह में एक - दो व्यक्ति नहीं, एक देश नहीं बल्कि पूरी दुनिया को बह जाना है , पुरानी से पुरानी सभ्यता भी खतम हुई है और जो लोग जगत प्रवाह को समझ चुके हैं वे आज भी बहाव में बह रहे हैं |
  • लेखक कहते हैं कि पुराने आर्य लोगों ने दुनिया के बहाव को ‘त्रिपुन - विभाग’ कहा है |इसका मतलब यह है कि वाहभाग जहां षडयन्त्र, बेमानी ना हो और मानव, प्रकृति के स्वभाव के अनुसार काम करे और वहाँ पर सतयुग या सतोयुग होता है |
  • मतलब यह कि प्राकृतिक वस्तुओं को बनाने का , सात्विक भावों का होने से समझा आता है कि प्रत्येक व्यक्ति एसे में स्वर्ग के सुख का अनुभव करता है, प्रकृति के प्रति अहसानमंद रहे और सच्चाई,लग्न,शरुद्धा और प्रेम में कोई कमी ना रहे |
  • भारत का इतिहास देखें तो भारत पर अनेकों आक्रमण हुए, देश को तोड़ने मरोड़ने के अनेकों प्रयास हुए फिर भी सतोगुण का उदय हुआ |
  • जैसे - जैसे सतोगुण की हानि होटि है , रजोगुण का जन्म लेना है , इसमें प्रमाद,नशा,आलस,प्यास,लालच, स्वार्थ, भेदभाव,हिंसा सब कुछ बढ़ता जाता है |
  • विलायत में रजोगुण बहुत फल फूल रहे है और रजोगुण की समाप्ति पर तमोगुण का जन्म होता है तो राग - द्वेष, बैर - फूट, ईर्ष्या, द्रोह, हिंसा,पशुता चालाकी और धूर्तता का जन्म होता है |
  • तमोगुण को ही जो लोग जीवन का परमसुख मानते हैं वे नरक के प्राणियों से भी तुच्छ हैं |
  • समाज - देश में अगर कोई बुराई है तो उसे सिर्फ बात करने , योजना बनाने और भाषणबाजी से दूर नहीं किया जा सकता उसके लिए काम करना पड़ेगा |
  • आज हम देख रहे हैं कि एक - दूसरे की देखा देखि में हर वो गलत काम लोग कर रहे हैं जो घर - परिवार, समाज - देश के लिए बुरा है|और धैर्य की नाव पर सवार होकर जाने से इस संसार से मुक्ति मिल जाएगी |
  • विशेषता: जगत प्रवाह निबंध में लेखक ने दुनिया के बहाव के बारे में कहा है कि जैसे नदी का पनि आगे ही बढ़ता है वैसे ही दुनिया भी आगे ही जा रही है, बीता हुआ समय वापस नहीं आ सकता है इसलिए इस जीवन को बहुत सोच समझकर जीना चाहिए , एसा कोई काम ना हो जो हानिकारक हो क्योंकि इसे मिटाया नहीं जा सकता , इसमें सुधार किया जा सकता है लेकिन वापस नहीं होगा | यह समय हर व्यक्ति के कर्म के अनुसार उसे फल देता है लेकिन समय किसी का रुकता नहीं है | दूसरी विशेष बात यह है कि दूसरों को गलत कार्य करते देखाकर प्रेरित नहीं होना चाहिए जिसके लिए लेखक ने विलायत में रजोगुण के बढ़ाने की बात की बात कही है कि उसकी हवा हमारे देश तक पहुँच गई है और विष फैला है , परिवारों का टूटना इसका एक उदाहरण है | मनुष्य के महान गुण धैर्य की महिमा लेखक ने बहुत अच्छी से समझाई है |इस संसार में आने पर जगत - प्रवाह में सबको बहना ही पड़ेगा इसलिए धीरजरूपी नाव का सहारा सभी ने लेना चाहिए |

    एक शब्द या वाक्य में उत्तर लिखिए; 1 x 10=10

    • लेखक ने किसके साथ अनुसंधान करने की बात कही है ? चौकसी
    • लेखक के अनुसार आत्मगौरव और धर्माचरण किससे साधता है? रुपये
    • तपस्वी, मनस्वी,संयमी को किसे देखकर फिसलते देखा है?रुपये
    • लेखक ने सिद्धार्थक को किसके पास भेजा?वृंदावन
    • वृंदावन, सिद्धार्थक को कैसा पुरुष समझता है?अद्भुत
    • वृंदावन को किसका घमंड था ? लियाकत
    • वृंदावन ने बाबू साहब की देखभाल के किए किससे कहा? नौकर
    • योग्यआभ्यासी,वेदन्ती मन मारकर क्या पुकारते हैं? शांति - शांति
    • पुराने आर्यों ने प्रवाह को क्या कहा? त्रिपुण विभाग
    • प्रकृति सब काम स्वभाव के अनुसार होने किसका उदय हुआ?सतोगुण
    • सतोगुण की हानी से किसका उदय ओटा है?रजोगुण
    • युग संध्या के क्रम पर कौन से गुण की तरक्की होती है?तमोगुण
    • कालचक्र की कैसी गति हिंदुस्तान में तमोगुण को प्रवाहित कर रही है?वक्र
    • प्रवृत्ति के नियमों में कैसी शक्ति है? मोहिनी
    • प्रतिदिन किसके उदय और अंत होने से उम्र घटती है?सूर्यदेव
    • लेखक ने प्रवाहमय भवसागर से पर होने के लिए क्या धरण करने को कहा है? धैर्य
    • महाभारत के कौन से पर्व मे जन्म मरण को महानदी का रुपक कहा है?वान
    • महाभारत के वानपर्व में जन्म मरण की महानदी पार करने के लिए किसकी नौका लेखक ने बताई है ? धैर्य
    • जगत प्रवाह निबंध के लेखक का नाम बालकृष्ण भट्ट है |
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