भारत महिमा - जयशंकर प्रसाद
summary/सारांश
हमारा यह प्यारा देश भारत हिमालय के आँगन के समान है। हर दिन उषा भारत को सूर्य की किरणों का उपहार देती है। ऐसा लगता है मानो हँसकर वह भारत-भूमि का स्वागत कर रही हो। ओस की बूँदों पर जब सुबह - सवेरे सूर्य की रश्मियाँ पड़ती हैं तो ऐसा लगता है जैसे उषा ने भारत को हीरों का हार पहना दिया हो। (जब सूर्य उगता रहता है उसे उषाकाल कहते है )
सबसे पहले ज्ञान का उदय भारत में ही हुआ अर्थात सबसे पहले हम जागे,फिर हमने पूरे विश्व में ज्ञान का प्रसार किया।इसका मतलब हमारी संस्कृति सबसे पुरानी है|इसके कारण पूरी दुनिया में उजाला हो गया| अज्ञान रूपी अंधकार दूर हुआ और संपूर्ण सृष्टि के सभी दुख-शोक दूर हो गए।
वाणी की देवी सरस्वती ने इस पवित्र भूमि पर प्रेम के साथ अपने कमल के समान कोमल हाँथ में वीणा उठाई, उसकी झंकार से सप्तसिंधुओं में सातों स्वरों की मोहक सरगम गूंजने लगी , मधुर संगीत का जन्म हुआ। इसी महान देश में संगीत के वेद सामवेद की रचना हुई।
भारत में जन्म लेने वाले मनु ने प्रलय और संकटों को सहन कर के संसार को बचाया |अरुण केतन मतलब लाल झण्डा लेकर पानी के रास्ते सभी जातियों को नाव में बिठाकर सुरक्षित बचाने का महान एवं मानवीय कार्य किया| केतन का मतलब होता है निशान |
दधीच वैदिक ऋषि थे। मानव कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने वाले मात्र महर्षि दधीचि ही थे। देवताओं के मुख से यह जानकर की मात्र दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र द्वारा ही असुरों का संहार किया जा सकता है, महर्षि दधीचि ने अपना शरीर त्याग कर अस्थियों का दान कर दिया।महर्षि दधीचि वेद शास्त्रों आदि के पूर्ण ज्ञाता और स्वभाव के बड़े ही दयालु थे। घमंड तो उन्हें छू तक नहीं पाया था। वे सदा दूसरों का हित करना अपना परम धर्म समझते थे। लोक कल्याण के लिये आत्म-त्याग करने वालों में महर्षि दधीचि का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है।राक्षसों से देवलोक की रक्षा करने के लिए दधीचि की हड्डियों की भस्म की आवश्यकता है तो उन्होंने पुरंदर मतलब इन्द्र देवता को अपनी हड्डियाँ दान मे दे दी थी और एक अनोखा इतिहास लिखा , पवि से लिखा है मतलब आग से जो बरसों बाद भी चमक रहा है | हम भारतीय इसे महान पूर्वजों की संतान हैं|
यहाँ श्रीराम का उदाहरण दिया है कि जिनक राज्याभिषेक होने वाला था उन्हें राजा न बनाकर जंगल में जाने का आदेश दे दिया|निर्वासित कर दिया निकाल दिया फिर भी ऊनका उत्साह कम नहीं पड़ा और उन्होंने अपनी इस वन गमन मे सिंधु मतलब समुद्र के बीच में एक सेतु बना दिया जिसे हम रामसेतु के नाम से जानते हैं जो रामेश्वरम में आज भी है|आज भी उसका भग्न मतलब टूटा रूप दिखाई देता है जो समुद्र में मगन है मतलब वह पुल आज मे समुद्र मे है |रत्नाकर मतलब समुद्र या सागर जिसके गर्भ में रत्न छिपे रहते हैं|
भारत वीरों और तपस्वियों की ही भूमि नहीं है बल्कि यहाँ समय - समय पर कुरीतियों का बहिष्कार भी हुआ है जैसे कि पहले धर्म के नाम पर बलि चढ़ाई जाती थी उसका विरोध हुआ और बंद कर दी गई तथा प्रेम, अहिंसा का पाठ भी पढ़ाया और दूसरों को सुख देने मे सुख और आनंद का अनुभव करना सिखाया |
भारत के लोगों ने शस्त्रों के बल पर देशों को नहीं जीता। पुराने समय से ही लोगों के मन में धर्म की प्रबल भावना रही है और उन्होंने संसार में धर्म का प्रचार किया। यहाँ गौतम बुद्ध और वर्धमान महावीर जैसे धर्मपुरुष हुए हैं, जिन्होंने विशाल राजपाट छोड़कर भिक्षु का स्वरूप धारण किया और घर-घर घूमकर लोगों का कष्ट दूर करने का प्रयास किया, धर्म का प्रचार किया।
भरतवंशियों ने यवन यूनानियों हराकर प्राण दान दिया मतलब दयापूर्वक क्षमा कर दिया। हमारे देश से ही चीन को धर्म की दृष्टि मिली। (भारत के महान सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए चीन, स्वर्ण भूमि अर्थात जावा और श्रीलंका भेजा) जावा और श्रीलंका के लोगों को पंचशील (अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, सत्य, ब्रह्मचर्य आदि) के सिद्धांत मिले।लेने मे नहीं देने सुख प्राप्त करना सिखाया
भारतवासियों ने कभी किसी की संपत्ति या किसी का राज्य छीनने का प्रयास नहीं किया। हमें प्रकृति ने सबकुछ हमे दिल खोल कर दिया है,प्रकृति की हमारे देश पर महान कृपा रही है। भारत सदा से हमारी जन्मभूमि है। हम इसी देश की संतानें हैं। हम बाहर किसी स्थान से आकर यहाँ नहीं बसे हैं। हमारा इतिहास सनातन है |
भारत और यहाँ की संस्कृति पुरानी है कई जातियों पवार में आई फिर उनका पतन, उतार - चढ़ाव रूप आंधी - तूफान आए सब का
सामना डट कर करने वाले , संघर्षों मे पलकर बड़े होने वाले हम भारतीय वीर हैं|
भारत के लोग सदा से चरित्रवान रहे हैं। हमारी भुजाओं में भरपूर शक्ति रही है। भारतीयों में वीरता की कभी कमी नहीं रही। साथ ही नम्रता सदा हमारा गुण रहा है। हमने कभी अपनी उपलब्धियों पर घमंड नहीं किया। हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति पर गर्व रहा है। हम कभी किसी को दुखी नहीं देख सके। दीन-दुखियों की सेवा करने के लिए हम भारतीय सदैव तत्पर रहते हैं।
हम धन और संपत्ति जमा करते भी थे, तो दान के लिए करते थे। दानवीरता भारतीयों का गुण रहा है। हमारे देश में अतिथियों को हमेशा भगवान के समान माना जाता था। भारत के लोग सत्य बोलना अपना धर्म मानते थे।ham सत्यवादी हरिश्चंद्र की संतानें हैं।) हमारे हृदय में तेज था, गौरव था। हम हमेशा वचन के पक्के हैं। प्राण जाए, पर वचन न जाए हमारा जीवनमूल्य रहा है।
आज भी हम भारतीयों की नसों में उन्हीं पूर्वजों का खून बह रहा है, आज भी हमारा देश वैसा ही है, भारतीयों में वैसा ही साहस है। भारतीय आज भी ज्ञान के क्षेत्र में सबसे आगे हैं। आज भी हम पहले के समान शांति के पुजारी हैं। देशवासियों में वैसी ही शक्ति है। हम उन्हीं प्राचीन आर्यों की दिव्य संतानें हैं। अत: आज भी हमारे मूल्य वही हैं जो पुराने समय में थे |
हम जब तक जिएँ, तो देश की आन बयान शान के लिए जिएँ। हमें इसकी सभ्यता और संस्कृति पर अभिमान है और हर्ष है कि हमने इस भूमि पर जन्म लिया है। यह हमारा प्यारा भारतवर्ष है। यदि कभी आवश्यकता पड़े, तो इसके लिए अपना सब कुछ भी न्योछावर कर देंगे| विकत परिसतिथियों मे भी न घबराने वाले वीर हैं हम |
विशेषता: भारत महिमा पाठ से यह संदेश मिलता है कि हमें भारतीय होने पर गर्व होना चाहिए। हम भारतीयों को भगवान की सेवा करने का मौका मिला है, और मोक्ष की प्राप्ति का भी अवसर मिला है । हमें देशभक्त होना चाहिए और अन्य भारतीयों से मिल-जुलकर रहना चाहिए।
भारत के लोगों ने युद्ध करके देशों को नहीं जीता। यहाँ पुराने समय से ही लोगों के मन में धर्म की भावना रही है और उन्होंने संसार में धर्म का प्रचार किया। गौतम बुद्ध और वर्धमान महावीर जैसे धर्मपुरुष हुए हैं, जिन्होंने विशाल साम्राज्य छोड़कर भिक्षु का स्वरूप धारण किया और घर-घर घूमकर लोगों का कष्ट दूर करने का प्रयास किया, धर्म का प्रचार किया। हमारे देश से ही चीन को धर्म की दृष्टि मिली| धरती की संतान को अपना भाई बंधु समझना भारतीयों का विशेष गुण है |कवि की आकांक्षा है कि हमें सदैव अपने देश पर इसकी सभ्यता और संस्कृति पर गर्व करना चाहिए. आवश्यकता पड़ने पर हमें देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने के लिए तत्पर रहना चाहिए, अपना इतिहास और समृद्धि की जानकारी सभी को होना चाहिए |
**********************************************
टिप्पणी लिखिए:
1. दधीचि का त्याग:
यह शीर्षक 'काव्याभिषेक' मे संकलित कविता 'भारत महिमा' से लिया गया है जिसके कवि जयशंकरप्रसाद है|दधीचि के त्याग के उदाहरण से कवि भारतीयों की उदारता का स्वभाव बताया है |
दधीच वैदिक ऋषि थे। मानव कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने वाले मात्र महर्षि दधीचि ही थे। देवताओं के मुख से यह जानकर की मात्र दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र द्वारा ही असुरों का संहार किया जा सकता है, महर्षि दधीचि ने अपना शरीर त्याग कर अस्थियों का दान कर दिया।महर्षि दधीचि वेद शास्त्रों आदि के पूर्ण ज्ञाता और स्वभाव के बड़े ही दयालु थे। घमंड तो उन्हें छू तक नहीं पाया था। वे सदा दूसरों का हित करना अपना परम धर्म समझते थे। लोक कल्याण के लिये आत्म-त्याग करने वालों में महर्षि दधीचि का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है।
राक्षसों से देवलोक की रक्षा करने के लिए दधीचि की हड्डियों की भस्म की आवश्यकता है तो उन्होंने पुरंदर मतलब इन्द्र देवता को अपनी हड्डियाँ दान मे दे दी थी और एक अनोखा इतिहास लिखा , पवि से लिखा है मतलब आग से जो बरसों बाद भी चमक रहा है | हम भारतीय इसे महान पूर्वजों की संतान हैं|
*********************************************
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें