स्त्रियां कविता की मूल संवेदना लिखिए
स्त्रियाँ कविता लेखिका अनामिका द्वारा लिखी गई है | अनामिका जी द्वारा लिखी में कविता में स्त्रियों के जीवन के मनोदशा का वास्तविक वर्णन किया होता है | अनामिका जी कविताएँ उनकी सशक्त आवाज़ है | उनकी कविता में स्त्रियों के अधिकार और उनके जीवन से जुड़ी हुई बातों के बारे में वर्णन किया गया होता है |
समाज में औरतों के साथ होने वाले भेद-भाव के कारण उनका संघर्ष बढ़ जाता है, उनकी योग्यता को महत्व नहीं दिया जाता है, समाज,परिवार की आवश्यक घटक होकर भी उसका कोई महत्व नहीं है उसे इस बात को मनाने के लिए बाध्य किया जाता है, इसके लिए वह समाज को संदेश दे रही है कि उन्हें ऊअनका अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए,अपने अधिकारों की बात करने वाली औरत बदचलन नहीं होती है, उसे किसी सरपरस्त की आवश्यकता नहीं है |
'स्त्रियाँ' कविता में अनामिका क्रियात्मक बोध के बरक्स स्त्री के वजूद को तलाशती हैं । इस कविता में पढ़ना, देखना और सुनना तीन क्रियाओं के प्रयोग द्वारा समाज कि उस चेतना को परखा गया है जिसके माध्यम से वे स्त्री को पढ़ते, देखते और सुनते हैं । और इतना ही नहीं भोगने की व्यथा की कथा भी अनामिका लिखती हैं ।
पुरुष प्रधान समाज से कहती है कि हमें बख्श दो, हमारे सरपरस्त ना बणो तो हमारा संघर्ष अपने - आप काम हो जाएगा , वे अपने निर्णय लेने और अपने पैरों पर खड़े होने में सक्षम है |
पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है काग़ज
बच्चों की फटी कॉपियों का
‘चनाजोरगरम’ के लिफ़ाफ़े के बनने से पहले!
देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद !
सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फ़िल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर
ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में !
भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह
व्याख्या: कवित्री ने आस -पास दिखने वाली बहुत सामान्य वस्तुओं से तुलना की है |इस कविता में देखना,सुनना,पढ़ना जैसी क्रियाओं से बताती हैं कि उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता है ,उन्हें महत्व नहीं दिया जाता है उनकी व्यक्ति,घर और समाज में आवश्यकता तो है लेकिन उन्हें महत्व न देने की मानसिकता दिखाती है|उन्हें कागज की तरह पढ़ते तो हैं लेकिन बच्चों की बेकार कॉपियाँ जो उपयोग होने के बाद, जिन्हें सावधानी से नहीं रखा गया है, वे फटी कॉपियाँ है मतलब अत्यंत व्यर्थ हो गई है |उन पन्नों को टाइमपास के लिए खाए जाने वाले चनाचोर गरम के कोन बनाने से पहले पढ़ लिया जाता और नहीं भी पढ़ते हैं और उपयोग के बाद फेंक दिया जाता और वह कहीं भी चला जाता है, यह बहुत दुखद है|
वे कहती हैं कि हमें देखा भी उतनी ही बेकार वस्तु की तरह देखा जाता है जैसे फालतू कागज को पढ़ा जाता है जैसे जब समय काटना मुश्किल होने लगता है तो परेशान होकर कलाई पर बंधी घड़ी को देखा जाता है कि अभी और कितना समय काटना है या उन्हें उस नापसंद समय की तरह देखा जाता है, जब बहुत सुबह अलार्म बजता है,जागने का मन नहीं करता मतलब घड़ी का यह समय अच्छा नहीं लगता और स्त्रियों को उसी नापसंद समय के समान देखा जाता है, जो जरूरी तो है लेकिन पसंद नहीं है |
हमें सुना भी एसे ही जाता है जैसे अत्यधिक भीड़-भरी बस में बेकार से गाने जो किसी कम गुणवत्ता या बेकार क्वालिटी के केसेट में मतलब घरघराहट के साथ गाना सुनना बहुत परेशानी होती है उसका सुरीलापन खत्म हो जाता है,केसेट की टेप घिस जाती है ,कोई फिल्मी गाना बजता है और सुनना चाहे या ना उस गाने को सुनना ही पड़ता है | एसी ही स्तिथि कवित्री अनामिका औरतों की बताती हैं |
अगर हमें भोगा जाता है तो वह भी एकदम अस्वस्थ तरीके से हैसे किसी दूर के रिश्तेदार के दुख के समान जिसे सुनकर नाटकीय दुख प्रकट किया जाता है और मन ही मन खुश होते हैं या फिर एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया जाता है, उनके दुख से कोई सरोकार नहीं होता है,कोई सहायता की पहल करने का विचार भी नहीं आता है,हमें भी उसी तरह उपयोग करके छोड़ दिया जाता है, इससे कोई लेन देना नहीं होता है |
विशेषता: इन तीनों ही क्रियाओं में कवित्री से बहुत ही साधारण तुलना की है जो विचार करने पर लगता है क्या सच में एसी स्तिथि किसी समाज में स्त्रियों की होती होगी ! अगर होती होगी तो तुलना सटीक है छजनाचोर गरम का लिफाफा बनाने वाले के पढ़ने की योगया कितनी होगी और उसके बाद वह लिफाफा काम होने के बाद बेपरवाही से फेंक दिया जाता है| समय और घड़ी की तुलना भी वैसे ही है जैसे समय मूल्यवान है लेकिन उसे अच्छा न लगने वाले समय तुलना औरत के व्यर्थता की नहीं व्यक्ति की व्यर्थ सोच को बताती है |भीड़ में सस्ते केसेट पर जबर्जस्ती सुनने वाले फीमली गाने की तुलना भी वैसी ही है कि टाइम पास के लिए गाना ब्याज रहा है और दूर के रिश्तेदार का होना न होना कोई मतलब नहीं रखता तो उसके दुख से किसको मतलब होगा |
एक दिन हमने कहा–
हम भी इंसान हैं
हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन।
देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग।
सुनो, हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा।
एक दिन हमने भी अपनी इच्छा व्यक्त की और आगे वह एक पढे लिखे समाज से अपने व्यक्तित्व की बात करती है कि हमें पढ़ना ही है तो चनाचोर गरम के लिफ़ाके ,फटी कॉपियों के पन्ने की तरह नहीं बल्कि जब बी. ए. की डिग्री लेने के बाद रोजगार की तलाश में व्याकुलता से नौकरी के विज्ञापन का एक एक शब्द पढ़कर उसमे अपनी योग्यता खोजते हो उसी लग्न और आवश्यकता से हमें पढ़ो, देखना है तो वैसे देखो जैसे कड़कड़ाती ठंढ में दूर कहीं जलती आग को देखते हो, उस आग की आवश्यकता लगती है वैसे ही जीवन में आवश्यक समझकर हमें देखो और सुनना है तो समाधि में लीन अंतर्मन की आवाज के समान सुनो न की भीड़ में कोई भी गाना सुनना पड रहा हो तथा नई सीखी हुई भाषा जिसका एक - एक शब्द ध्यान से सुनते हैं और प्रयोग बहुत सावधानी से करते हैं हमें भी उसी तरह समझो न कि हल्के में लो| इस तरह कवित्री अनामिका ने शब्दों में अधिक समझाया है|
विशेषता: स्त्री को आवश्यक है कि वह अपनी गरिमा बनाए तब ही वह पुरुष से अपने अधिकार की बात कहने का अधिकार रखती है, जीवन में कभी भी शॉर्टकट का रास्ता स्थाई सुख नहीं दे सकता|
इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफ़वाहें
चींखती हुई चीं-चीं
‘दुश्चरित्र महिलाएं, दुश्चरित्र महिलाएं–
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली फैलीं
अगरधत्त जंगल लताएं!
खाती-पीती, सुख से ऊबी
और बेकार बेचैन, अवारा महिलाओं का ही
शग़ल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ।
फिर, ये उन्होंने थोड़े ही लिखीं हैं।’
(कनखियाँ इशारे, फिर कनखी)
बाक़ी कहानी बस कनखी है।
हे परमपिताओं,
परमपुरुषों–
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!
स्त्री का अपने विषय में इतना कहाना ही था और उनका भी इतना सुनना ही था कि समाज, दीन - दुनिया का इतना सुनना ही था कि अचानक से एक टहनी हवा में लटक पड़ी और उस पर से अनेकों टिड्डियाँ उडी और अपने अधिकार की बात करने वाली औरतों बदनाम,चरित्रहीन कहकर अफवाह फैला दिया,दुष्प्रचार कर दिया(दल बाँधकर उड़नेवाला बड़ा कीड़ा जो फसल को नष्ट कर देता है) जो स्त्री बोलती है वह बहकी है ,आवारा है|और वह महिलायें जो किसी का सहारा लेकर अपने - अधिकारों प्राप्त करती हैं और वह महिलायें जो किसी का सहारा लेकर अपने - अधिकारों प्राप्त करती हैं अपणे सरपरस्तों की मेहरबानी से, उनका सहारा लिए ये अगरधत्त लताएं हैं इनकी अपनी कोई योग्यता नहीं है, वह सब उपलब्ध करते है जो रंगिनियाँ वे चाहती हैं, वे औरतें अपने आप खड़ी नहीं हो सकती , वे लताएं है उन्हें किसी न किसी का सहारा चाहिए,एसे सरपरस्त एक ही चश्मे से सभी महिलाओं को देखते है | साहित्य रचना करने वाली महिलाओं के पुरुष समाज बेकार,अतृप्त,आवारा कह कर उनका आतमिशवास तोड़ते हैं क्योंकि वे एसे सरपरस्तों के जाल में नहीं फँसती |
विशेषता: कवित्री कहती है कि साहित्य रचना महिलायें नहीं करती वो तो लोगों की तिरछी निगाहें, इशारे , छुप कर आंखेनगड़ाने वालों के अनुभव उनसे लिखवाते हैं | और अंत में पुरुष प्रधान समाज से वह कहती हैं कि हम पर अपनी मेहरबानी बंद करो, हमारे सरपरस्त न बनो , बस हमें अपना जीवन अपने - आप जीने दो | हमने छोड़ दो , हम अपना भला अपने आप कर लेंगी |
*******************
कवित्री ने आस -पास दिखने वाली बहुत सामान्य वस्तुओं से तुलना की है |इस कविता में देखना,सुनना,पढ़ना जैसी क्रियाओं से बताती हैं कि उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता है ,उन्हें महत्व नहीं दिया जाता है उनकी व्यक्ति,घर और समाज में आवश्यकता तो है लेकिन उन्हें महत्व न देने की मानसिकता दिखाती है|उन्हें कागज की तरह पढ़ते तो हैं लेकिन बच्चों की बेकार कॉपियाँ जो उपयोग होने के बाद, जिन्हें सावधानी से नहीं रखा गया है, वे फटी कॉपियाँ है मतलब अत्यंत व्यर्थ हो गई है |उन पन्नों को टाइमपास के लिए खाए जाने वाले चनाचोर गरम के कोन बनाने से पहले पढ़ लिया जाता और नहीं भी पढ़ते हैं और उपयोग के बाद फेंक दिया जाता और वह कहीं भी चला जाता है, यह बहुत दुखद है|
वे कहती हैं कि हमें देखा भी उतनी ही बेकार वस्तु की तरह देखा जाता है जैसे फालतू कागज को पढ़ा जाता है जैसे जब समय काटना मुश्किल होने लगता है तो परेशान होकर कलाई पर बंधी घड़ी को देखा जाता है कि अभी और कितना समय काटना है या उन्हें उस नापसंद समय की तरह देखा जाता है, जब बहुत सुबह अलार्म बजता है,जागने का मन नहीं करता मतलब घड़ी का यह समय अच्छा नहीं लगता और स्त्रियों को उसी नापसंद समय के समान देखा जाता है, जो जरूरी तो है लेकिन पसंद नहीं है |
हमें सुना भी एसे ही जाता है जैसे अत्यधिक भीड़-भरी बस में बेकार से गाने जो किसी कम गुणवत्ता या बेकार क्वालिटी के केसेट में मतलब घरघराहट के साथ गाना सुनना बहुत परेशानी होती है उसका सुरीलापन खत्म हो जाता है,केसेट की टेप घिस जाती है ,कोई फिल्मी गाना बजता है और सुनना चाहे या ना उस गाने को सुनना ही पड़ता है | एसी ही स्तिथि कवित्री अनामिका औरतों की बताती हैं |
अगर हमें भोगा जाता है तो वह भी एकदम अस्वस्थ तरीके से हैसे किसी दूर के रिश्तेदार के दुख के समान जिसे सुनकर नाटकीय दुख प्रकट किया जाता है और मन ही मन खुश होते हैं या फिर एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया जाता है, उनके दुख से कोई सरोकार नहीं होता है,कोई सहायता की पहल करने का विचार भी नहीं आता है,हमें भी उसी तरह उपयोग करके छोड़ दिया जाता है, इससे कोई लेन देना नहीं होता है |
विशेषता: इन तीनों ही क्रियाओं में कवित्री से बहुत ही साधारण तुलना की है जो विचार करने पर लगता है क्या सच में एसी स्तिथि किसी समाज में स्त्रियों की होती होगी ! अगर होती होगी तो तुलना सटीक है छजनाचोर गरम का लिफाफा बनाने वाले के पढ़ने की योगया कितनी होगी और उसके बाद वह लिफाफा काम होने के बाद बेपरवाही से फेंक दिया जाता है| समय और घड़ी की तुलना भी वैसे ही है जैसे समय मूल्यवान है लेकिन उसे अच्छा न लगने वाले समय तुलना औरत के व्यर्थता की नहीं व्यक्ति की व्यर्थ सोच को बताती है |
भीड़ में सस्ते केसेट पर जबर्जस्ती सुनने वाले फीमली गाने की तुलना भी वैसी ही है कि टाइम पास के लिए गाना ब्याज रहा है और दूर के रिश्तेदार का होना न होना कोई मतलब नहीं रखता तो उसके दुख से किसको मतलब होगा |
आगे वह एक पढे लिखे समाज से अपने व्यक्तित्व की बात करती है कि हमें पढ़ना ही है तो चनाचोर गरम के लिफ़ाके ,फटी कॉपियों के पन्ने की तरह नहीं बल्कि जब बी. ए. की डिग्री लेने के बाद रोजगार की तलाश में व्याकुलता से नौकरी के विज्ञापन का एक एक शब्द पढ़कर उसमे अपनी योग्यता खोजते हो उसी लग्न और आवश्यकता से हमें पढ़ो, देखना है तो वैसे देखो जैसे कड़कड़ाती ठंढ में दूर कहीं जलती आग को देखते हो, उस आग की आवश्यकता लगती है वैसे ही जीवन में आवश्यक समझकर हमें देखो और सुनना है तो समाधि में लीन अंतर्मन की आवाज के समान सुनो न की भीड़ में कोई भी गाना सुनना पड रहा हो तथा नई सीखी हुई भाषा जिसका एक - एक शब्द ध्यान से सुनते हैं और प्रयोग बहुत सावधानी से करते हैं हमें भी उसी तरह समझो न कि हल्के में लो| इस तरह कवित्री अनामिका ने शब्दों में अधिक समझाया है|
उपसंहार: पुरुष-प्रधान समाज में महिलाओं पर होने वाली मानसिक प्रताड़ना को कवित्री ने सरपस्त शब्द से बहु अच्छी तरह स्पष्ट किया है और टिड्डियाँ जैसे फसल खराब करती है वैसे ही मनुष्य रूपी टिड्डियाँ समाज को दूषित करते हैं |
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें