साम्राज्ञी का नैवेद्य-दान - सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
संदर्भ: जापान में बौद्ध धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में है , जापान की रानी के लिए ‘साम्राज्ञी’ शब्द का प्रयोग हुआ है,उनका नाम कॉमियों था,राजधानी नारा में स्थित महाबोधि मंदिर में बुद्ध के दर्शन के लिए जाते समय उनके मन में उमड़ने वाले भावों को कि भेंट करने के लिए क्या लेकर जाएँ | बहुत चिंतन - मनन के बाद खाली हाथ ही भगवान के दर्शन करने जाती है,और इस तथ्य में भी महान दर्शन छिपा है |
हे महाबुद्ध!
मैं मंदिर में आयी हूँ
रीते हाथ:
फूल मैं ला न सकी।
औरों का संग्रह
तेरे योग्य न होता।
शब्दार्थ: रीते - खाली |संग्रह- संपत्ति |योग्य - लायक |
संदर्भ:जापान की सम्राज्ञी कोमियो प्राचीन राजधानी नारा के बुद्ध-मंदिर में जाते समय असमंजस में पड़ गई थी कि चढ़ाने को क्या ले जाए और फिर रीते हाथ गई थी। यही घटना कविता का आधार है।
व्याख्या:जापान की रानी कॉमियों भगवान बुद्ध की श्रेष्ठ भक्त हैं, साम्राज्ञी के मनोभावों को कवि ने बहुत श्रद्धा से व्यक्त किया है|माना जाता है सबसे अधिक सौन्दर्य फूलों का तब होता है जब वह अपनी शाखाओं पर रहता है | इसीलिए साम्राज्ञी कहती हैन कि प्रभो मैं आपको अर्पण करने के लिए फूल भी न ला सकी खाली हाथ ही आई हूँ| ये फूल आपके योग्य नहीं हैं , ये तो किसी और का संग्रह या संपत्ति है , किसी और से लेकर मैं आपको कैसे चढ़ा सकती हूँ |पुष्प तो अपने पेड़ का संग्रह है, किसी और की वस्तु आपके योग्य नहीं हो सकती है|
विशेषता: साम्राज्ञी अपनी असमर्थता भगवान को बताया रही है क्योंकि अन्य भक्तगन तो बहुत कुछ लेकर मंदिर जाते हैं लेकिन मई अपजो मुझे सुनाती
जीवन के विह्वल सुख-क्षण का गीत
तेरी करुणा
बुनती रहती है
भव के सपनों, क्षण के आनंदों के
रह: सूत्र अविराम-
उसे भोली मुग्धा को कँपती
डाली से विलगा न सकी।
शब्दार्थ: विह्वल - दुख , अशांत |करुणा - प्रेम , दया |अविराम - लगातार | भाव - संसार |
मुग्धा - सबको सुंदर लगाने वाली |विलगा - अलग ,दूर करना |ना पवित्र हृदय लेकर आई हूँ |और फूल तो किसी और की संपत्ति है किसी और से लेकर आपको मैं नहीं देना चाहती हूँ |
संदर्भ:जापान की सम्राज्ञी कोमियो प्राचीन राजधानी नारा के बुद्ध-मंदिर में जाते समय असमंजस में पड़ गई थी कि चढ़ाने को क्या ले जाए और फिर रीते हाथ गई थी। यही घटना कविता का आधार है।
व्याख्या:ये जो फूल हैं वे अपने स्थान पर पुलकित होकर दुख के समय में भी खुशी के गीत सुनाते है |आपकी करुणा से दुनिया के लोगों को जीवन के सपने दिखाते हैं और आनंद के क्षणों को अधिक बढ़ाते ही रहते हैं| फूलों का जीवन बहुत छोटा होता है लेकिन वह अपनी सुगंध, सुंदरता नहीं छोड़ती तथा विपरीत स्तिथि में भी वे खिलते ही रहते हैं और इस प्रकार फूल अपने स्थान पर रहकर दुनिया के लोगों को लगातार खुशी और जीवन के संदेश देते ही रहते हैं, एसे भोले - भाले ,सुंदर , निस्वार्थ फूल को मैं उसकी डाली से अलग न कर सकी औ इसीलिए खाली हाथ आई हूँ |
विशेषता:अहिंसावादी भगवान की परम भक्त साम्राज्ञी फूल को तोड़ने में भी अहिंसा देखती हैं कि उन्हें डाली से अलग कर देना भी अहिंसा है क्योंकि समय से पहले फूल को तोड़ लेने से फूल प्राणहीन हो जाता है |
जो कली खिलेगी जहाँ, खिली,
जो फूल जहाँ है,
जो भी सुख
जिस भी डाली पर
हुआ पल्लवित, पुलकित,
मैं उसे वहीं पर
अक्षत, अनाघ्रात, अस्पृष्ट, अनाविल,
हे महाबुद्ध!
अर्पित करती हूँ तुझे।
शब्दार्थ: पल्लवित-विकसित|निमिष - क्षण |नैवेद्य - भगवान का भोग |पुलकित-खुश शब्दार्थ: अक्षत - साबुत| अनाघ्रात - जिसे सूंघा न हो | अस्पृष्ट - अनछुआ | अनाविल - कीचड़ से दूर, निर्मल , स्वच्छ | निमिष - क्षण|
संदर्भ: साम्राज्ञी भगवान से निवेदन कर रही है |
व्याख्या:कविता के अगले अंश में कवि कहते हैं कि साम्राज्ञी की उलझनभरी मन:स्तिथि का वर्णन किया है, रानी कहती हे महाबुद्ध ! संसार का कल्याण पूरे अस्तित्व को सुरक्षित रख कर ही हो सकता है | पूरे जीवन को महत्व देते हुए रानी कहती है कि जो कलि जिस डाल पर खिली है,जो फूल जहां भी शोभा बढ़ा रहा और सुगंध फैला रहा है या जहां भी रहकर जीवन से जुड़ा है, खुशी से पल्लवित, पुलकित है , बस वहीं पर, उसे बिना तोडे, उसे जीवन से अलग किये बिना, बिना उसे कोई हानि पहुंचाए , बिना छूए ,उसी पवित्र रूप से आपको समर्पित करती हूँ | एसे अनोखे पूजन सामग्री के लिए कवि ने अक्षत,अनाघ्रात,अस्पृश्य ,अनाविल का प्रयोग किया है | हिंसा के वातावरण में यह भाव सटीक है |
विशेषता: फूलों की सुंदरता उनके वृक्ष पर ही शोभित होती है और वहीं रहकर वह भगवान को अर्पित होते हैं |फूलों को तोड़ना भी हिंसा ही है |
वहीं-वहीं प्रत्येक भरे प्याला जीवन का,
वहीं-वहीं नैवेद्य चढ़ा
अपने सुंदर आनंद-निमिष का,
तेरा हो,
हे विगतागत के, वर्तमान के, पद्मकोश!
हे महाबुद्ध!
शब्दार्थ: डाली - पेड़ - पौधों क शाखा|पल्लवित - विकसित | निमिष - क्षण|
नैवेद्य - भगवान का भोग |पुलकित-खुश|
व्याख्या: कवि कहते हैं कि प्रभु के चरणों में भक्ति व्यक्ति अपने स्थान से भी चढ़ा सकते हैं कि जो जहन्न है हृदय रूपी प्याले में परे,करुणा,दया और अहिंसा के भावों को भरकर रखे और वहीं से भगवान का नैवेद्य अपने पवित्र भावों से चढ़ाता रहे| जीवन के आनंद के क्षणों में भगवान को याद करते रहे यहीभगवान का सच्चा नैवेद्य या भोग है,चढ़ावा है |
हे विगतागत अर्थात जो बीत चुका और आने वाले समय में तथा वर्तमान में हे महाबुद्ध आपके विचार पदमकोश के रूप में हमारा मार्गदर्शन करते रहें |
विशेषता: प्रभु की भक्ति पुष्प,हर - माला या अन्य वस्तुओं में नहीं बल्कि मानवता के गुणों में होती है , यही भाव कवि ने रानी कॉमियों के विचारों से व्यक्त किये हैं |
प्रश्न 1: एक शब्द या वाक्य में उत्तर लिखिए; 1 x 10=10
- साम्राज्ञी मंदिर में कैसे गई ? खाली हाथ/रीते हाथ
- मंदिर में रीते हाथ कौन गई ? साम्राज्ञी
- साम्राज्ञी ने फूलों को किसका संग्रह कहा है? औरों
- साम्राज्ञी ने भगवान के योग्य किसे नही माना है? औरों का संग्रह
- कवि ने भोली मुग्धा किसे कहा है? फूलों
- भोली मुग्धा को कैसी डाली से विलगा न सकी? कँपती
- फूल जहां खिला है वहीं से साम्राज्ञी किसे समर्पित करती हैं ? महाबुद्ध
- जीवन के प्याले का नैवेद्य किसे चढ़ाने की बात कवि कहते हैन? महाबुद्ध
- विगतागत किसे कहा गया है ? महाबुद्ध
- साम्राज्ञी का नैवेद्य के रचनाकर कौन हैं ? सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
सारांश:जापान की रानी कॉमियों भगवान बुद्ध की श्रेष्ठ भक्त हैं, साम्राज्ञी के मनोभावों को कवि ने बहुत श्रद्धा से व्यक्त किया है|माना जाता है सबसे अधिक सौन्दर्य फूलों का तब होता है जब वह अपनी शाखाओं पर रहता है | और वहीं निर्मल रूप में खिलता रहता है, और वह भी वहीं पर अधिक खुश रहता है , अपने स्थान पर रहकर ही फूल भगवान को समर्पित रहते है, यह भी सच है कि फूल को तोड़ लेने से फूल के पौधे, शाखा और पुष्प को भी दुख होता है, कष्ट होता है तथा फूल प्राणहीन हो जाते हैं | फूल को डाल से तोड़ लेना अर्थात शिशु को माँ की गोद से छिन लेना | इन्ही कारणों से साम्राज्ञी कहती है - हे महाबुद्ध ! मैं आपके मंदिर में खाली हाथ आई हूँ ,आपको समर्पित करने के लिए मेरे साथ कुछ नहीं लाई हूँ , दूसरों के जैसे फूल - माला या अन्य कोई सामग्री मेरे हाथ में कुछ नहीं है लेकिन मेरे मन में आपके लिए पवित्र भाव हैं और यही मेरी पूजा सामग्री और विधि - विधान है, मेरे हाथ में कोई सामग्री नहीं है ,लोग आपको अन्य फूल - माला चढ़ाते हैं लेकिन फूल का स्थान तो अपनी शाखा है, उसे तोड़ना भी तो हिंसा होगी |इसलिए आपको पुष्प चढ़ाना मुझे उचित नहीं लगता, इससे मुझे गौरव का अनुभव नहीं होता है, हे महाबुद्ध आप स्वयं बौद्धिक विवेक और करुणा के परम प्रतीक हैं इसलिए ही आप मेरे मानसिक द्वन्द समझ सकते हैं कि मैं क्यों खाली हाथ आपके दर्शन करने आई हूँ |
संसार का कल्याण पूरे अस्तित्व को सुरक्षित रख कर ही हो सकता है | पूरे जीवन को महत्व देते हुए रानी कहती है कि जो कलि जिस डाल पर खिली है,जो फूल जहां भी शोभा बढ़ा रहा और सुगंध फैला रहा है या जहां भी रहकर जीवन से जुड़ा है, खुशी से पल्लवित, पुलकित है , बस वहीं पर, उसे बिना तोडे, उसे जीवन से अलग किये बिना, बिना उसे कोई हानि पहुंचाए , बिना छूए ,उसी पवित्र रूप से आपको समर्पित करती हूँ | एसे अनोखे पूजन सामग्री के लिए कवि ने ‘अक्षत,अनाघ्रात ,अस्पृश्य , अनाविल का प्रयोग किया है | हिंसा के वातावरण में यह भाव सटीक है |धैर्य और संतोष को जीवन की पूंजी मानकर आगे बढ़ाना चाहिए | साम्राज्ञी ने अपने आराध्य भगवान बुद्ध को विगतागत ( जो बीत गया और जो आने वाला है ) तथा वर्तमान के पदमकोश ‘ के सम्बोधन से अतीत में ही नहीं, वर्तमान समय में भी बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता को स्पष्ट किया है |
विशेषता: आज के जीवन में भयानक होड लगी है, हम अपनी चिंता, स्वार्थ में डूबे रहते है लेकिन यह भूल जाते हैं कि दूसरे भी इस धरती पर समान अधिकार से हैं | हमे अपने जीवन की मूलभूत सुंदरता, योग्यता को बचाए रखना जरूरी है| अहिंसा के सच्चे संदेश को दिया है कि भगवान दिखावटी वस्तु को पूजा नहीं स्वीकार करते बालक सच्ची भावना ही असली पूजाहै|यह कविता गरिमा, मूल्यपरकता, मानवीय पक्षधरता,करुणा, जीवन - विवेक आदि शाश्वत मूल्यों को प्रतिष्ठित करती है |
प्रश्न 4: टिप्पणी लिखिए; साम्राज्ञी का नैवेद्य
साम्राज्ञी का नैवेद्य-दान,प्रस्तुत कविता प्रयोगवादी तार सप्तक के प्रवर्तक कवि अजेय द्वारा रचित कविता है।इसमें कवि ने एक भक्तिन के माध्यम से उसके मन के भावों को व्यक्त कराया है, जो भगवान की पूजा, करना चाहती है, परन्तु वह अपने साथ सामग्री नहीं लाई है। वह खाली हाथ है। उसके पास केवल उसके मन के भाव हैं, जो भगवान से जुड़े हुए हैं। भक्ति भावना से युक्त वह कहती है, भगवान बुद्ध! मैं तुम्हारे इस मंदिर में तुम्हारी री पूजा करने के लिए आई हूँ मेरे पास तुम्हारे सामने चढ़ाने के लिए, या पूजा-पाठ करने के लिए सामग्री नहीं है। मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है। ये हाथ खाली हैं। मगर मेरे मन में केवल, पवित्र-भक्ति-भाव हैं, जिन्हें मैं तुम्हें अर्पित करना चाहती हूँ। मेरे भाव ही मेरी पूजा की सामग्री हैं। मेरे पास, फूल-फल भी नहीं हैं, जिन्हें मैं तुम्हारे समक्ष चढ़ा सकूँ। दूसरे लोग अपने साथ विभिन्न प्रकार की पूजा की सामग्री, लेकर आते हैं और तुम्हें खुश करने की कोशिश करते हैं, परन्तु मैं ऐसा न कर सकी हूँ । मैं तो खाली हाथ ही आई हूँ। उनकी थाली में तरह-तरह की एकत्र की गई सामग्रियाँ होती हैं। वे बड़े आदमी हैं मगर, मेरे पास तो केवल मेरे भाव ही हैं। मेरी दृष्टि में यह तरीका शायद तेरे लिए ठीक होगा।, उनमें दिखावटीपन है। वे लोग समर्थ हैं। मगर मेरे पास पवित्र भाव एवं तेरे प्रति श्रद्धा है। मैं केवल यही अर्पित कर, समती हूँ । तुम चाहे इसे स्वीकार करो या न करो। वह तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है। क्योंकि फूल को तोड़ना भी मुझे, हिंसा लगती है। मेरी भावना ही आपको समर्पित है। यदि वह भक्तिन या पुजारिन मुझे अपने मन के भावों और विचारों से अवगत कराती है तो कितना अच्छा होता! मैं, उससे उसके बारे में जानने का सुअवसर पाता तो यह मेरे लिए उपयुक्त होता। अर्थात् है उसको जानने या, समझने का मौका मिलता। पर वह मुझ से दूर है। वह मुझे निश्चय ही अपने जीवन में होंगे अर्थात् उसने उन्हें, भोगा होगा यह स्थितियाँ उसके लिए कितनी कष्ट पूर्ण रही होंगी। जीवन वैसे भी सुख-दुख का मिश्रण है। गरीबों, के जीवन में अभाव-ग्रस्तता होती है।
जापान की सम्राज्ञी कोमियो बुद्ध के अहिंसावादी विचारों से बहुत प्रभावित थीं। एक बार वे जापान की प्राचीन राजधानी नारा के बुद्ध-मंदिर में जाते समय असमंजस में पड़ गई कि चढ़ाने के लिए क्या ले जाएँ ( क्योंकि फूलों को तोड़ना भी हिंसा है ) और फिर खाली हाथ ही चली गयीं। यही घटना कविता का आधार है |
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