कृष्ण की चेतावनी - रामधारी सिंह दिनकरSUMMARY ANNOTATION QU & ANSKrishn ki Chetavani Rmadhari Singh‘Dinakar’
कृष्ण की चेतावनी - रामधारी सिंह दिनकर
यह प्रसंग राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के काव्य-संग्रह 'कृष्ण की चेतावनी' से लिया गया है। जब कृष्ण दुर्योधन की सभा में शांति दूत बनकर जाते हैं और मात्र पांच गांव की मांग करते हैं।उस पर भी वह मना कर देता है और युद्ध के लिए अडिग रहता है।
उसके बाद कृष्ण अपना विराट स्वरूप दिखाते हैं और युद्ध के लिए ललकार कर आते हैं। वहां से वापसी के मार्ग में उन्हें कर्ण दिखाई देता है। तत्पश्चात् कृष्ण उसे अपने रथ में बिठा लेेते हैं। देखें इसे दिनकर ने कितने सुंदर शब्दों में वर्णित किया है।
कृष्ण की चेतावनी का पूरा भावार्थ है कि हमें धर्मपरायण और न्यायपरायण जीवन जीना चाहिए। कृष्ण ने अपने जीवन में न्याय का पालन किया और धर्म की रक्षा की। उन्होंने अधर्मियों को सजा देने का संकल्प किया और धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा दी।
वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।
शब्दार्थ:बाधा-विघ्नों-रुकावट,अड़चन|निखर-स्वच्छ|
संदर्भ: महाभारत के युद्ध के फैसले के पहले जब द्यूत क्रीडा में हारने के बाद और वे सभी नियम पालन करने के बाद पांडव वापस आते हैं तब भगवान कृष्ण कौरवों के पास पांडवों की तरफ से संधि का प्रस्ताव लेकर जाते हैं और उस समय किस प्रकार युद्ध करने का निर्णय लिया गया |
व्याख्या: कृष्ण जी कौरवों के पास जाकर पांडवों के विषय में कहते हैं कि नियम के अनुसार वे जंगलों में घूम-घूमकर और मुश्किलों का सामना करके,राजकुमार होकर भी वे धूप,बरसात में भटकते रहे,पत्थरों पर चलते रहे लेकिन ये सभी कष्ट सहकार वे एसा लगता है अधिक मजबूत होकर आए हैं | सौभाग्य हर समय सोता नहीं हैं अब उनके भाग्य चमकने वाले है, देखें आने वाले समय में क्या होता है|
विशेषता: जीवन में कठिनाइयाँ व्यक्ति को अधिक मजबूत बनाती हैं इस लिए मुश्किलों से घबराना नहीं चाहिए |
मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।
शब्दार्थ: सुमार्ग - सही राह|विध्वंस -विनाश|भीषण-भयंकर
व्याख्या: कृष्ण भगवान पांडवों का संधि संदेश लेकर हस्तिनापुर आए है और कहते हैं कि मैं मित्रता कराने और सभी को सही रास्ते पर चलने के का संदेश लेकर आया हूँ तथा दुर्योधन को समझाने के लिए कि अगर दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो बहुत बड़ा विनाश होने से बच जाएगा |
विशेषता: भगवान पांडवों के दूत बनकर दुर्योधन के पास आए हैं और अपनी गलती मालूम समझ जाना मनुष्य की बड़ी जीत है|
‘दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!
शब्दार्थ:बाधा-रुकावट |
ग्राम-गाँव
व्याख्या: कृष्ण जी कौरवों के सामने संधि का प्रस्ताव इस प्रकार रखते हैं कि अगर पांडवों के साथ न्याय करना चाहते हो तो उन्हें उनके अधिकार का आधा राज्य दे दिया जाए लेकिन आपको अगर उनके अधिकार का आधा राज देने में कोई समस्या है तो 5 पांडवों को 5 गाँव ही दे दीजिए और बाकी की पूरी धरती आप अपने पास ही रख लीजिए हम उसमें भी खुश हैं और उसी में सुख से अपना जीवन बिताएंगे क्योंकि अपने अधिकार के लिए लड़कर हम अपने परिवारजनों पर तलवार या हथियार उठाना नहीं चाहते |
विशेषता:संपत्ति और एशवरी से बढ़ाकर आत्मीयता को महत्व देना चाहिए|
दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशीष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।
शब्दार्थ:आशीष-आशीर्वाद|असाध्य-असंभव |मनुज-मनुष्य
व्याख्या: जिस प्रकार विनाश के समय बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है वैसा ही दुर्योधन के साथ भी हो रहा था इसलिए उसने संधि प्रस्ताव को ठुकरा दिया, अगर वह प्रस्ताव माँ लेता तो उसे भाइयों के प्रेम,शक्ति के साथ आशीर्वाद भी मिलता लेकिन उसके नाश का समय आअ गया था और वह प्रस्ताव लेकर आने वाले दूत कृष्ण जी बंदी बनाने का दुस्साहस भी करता है |
विशेषता:दुर्योधन के विनाश का अंदेशा पहले ही मिल गया था, वह अपने में सुधार कर सकता था|नियम तोड़ने वालों का हाल दुर्योधन के समान होता है |
हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।
शब्दार्थ:भीषण-भयंकर|कुपित -क्रोध |हुंकार-ललकार |
व्याख्या: दुर्योधन संधि प्रस्ताताव को ठुकराकर भगवान को बांधना चाहता है तो वे दुर्योधन को ललकारते हैं और अपना विशाल रूप दिखाते हैं कि तू मुझे बांधना चाहता हाई तो बांध | एसा करते हि दसों दिशा डगमगाने लागि, भगवान बाट गुस्से में बोले कि मुझे पकड़ने वाली जंजीर बढ़ाते जा मई भी देखूँ तू मुझे कैसे बांधता है , ए दुर्योधन बांधकर दिखा मुझे |
विशेषता: दुर्योधन का लालच और घमंड उसे और पूरे खानदान को ले डूबा इसलिए व्यक्ति को दुर्गुणों से बचना चाहिए |
यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।
शब्दार्थ:गगन-आकाश|पवन-वायु|सकल-ससारा,समस्त |
व्याख्या: तू मुझे बांधना चाहता है तो बांध , ये आसमान मुझ में समाया है, यहा हवा मेरी है, समस्त चेतना मुझसे समाई है ,सारा संसार मुझसे संचालित है , जीवन - मृत्यु मुझमें ही समाहित है , तू कैसे मुझे बांधेगा, मेरे इस रूप को बांधने वाली जंजीर ला और बांध मुझे|
विशेषता: भगवान कृष्ण ने पंचतत्वों का उनमें विलीन होने की बात बताई है कि भगवान एक अदृश्य सत्ता है जो देख नहीं सकते लेकिन समझ सकते हैं |
‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।
शब्दार्थ:उदयाचल-एक कल्पित पर्वत जिसके पीछे से सूर्य का उदय होना माना जाता है।परिधि-घेरा|पग-पैर|
व्याख्या: कृष्ण जी अपनी विशालता के विषय में दुर्योधन से बताते हुए कहते हैं कि मेरा चमता हुआ माथा उदयाचल है,धरती मेरा सीना और मेरी भुजाओं ने पूरी धरती को घेरा हुआ है,मैनाक पर्वत मेरे पैर हैं,गृह - नक्षत्र जो चमते हुए दिखते हैं वे सब मेरे मुंह के अंदर हैं अर्थात तू अगर मुझे बांधना चाहता है तो यह ले मैं क्या हूँ और तू उसी हिसाब से बांधने के लिए जंजीर ला|
विशेषता: यहाँ भगवान अपनी विशालता अपनी महानता बताने के लिए नहीं बताया रहे है बल्कि दुर्योधन को एक मौका और दे रहे है यह सोचने के लिए कि क्या वह मुझे बांध पाएगा |
‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।
शब्दार्थ:दृग-आँखें |चर अचर -एक जगह स्थिर रहने और न रहने वाले |
व्याख्या: भगवान कृष्ण कहते हैं कि हे दुर्योधन अगर तेरी आँखें है तो वह अनुपम दृश्य देख , तू मुझे बांधने का प्रयास कर रहा है लेकिन सारा ब्रह्मांड मेरे अंदर है,जीवित-मृत, सारी दुनिया, नाशवानाऊर अमर सभी मुझमें बसे हैं, सूर्य,चंद्रमा,नदियां,तालाब,समुद्र सभी मुझमे समय जाते हैं और अगर मुझे बांधना चाहते हो तो इन सभी को भी बांधना पड़ेगा | क्या कर पाओगे|
विशेषता: यहाँ भगवान अपनी विशालता अपनी महानता बताने के लिए नहीं बताया रहे है बल्कि दुर्योधन को एक मौका और दे रहे है यह सोचने के लिए कि क्या वह मुझे बांध पाएगा|
‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।
शब्दार्थ:कुंतल-बाल |पद-पैर |विकराल-भयंकर |
व्याख्या: कृष्ण जी दुर्योधन को अपना विकराल रूप दिखाते है कि आकाश में देख बालों के जैसा घना जाल फैला है,और पैरों के नीचे जो पाताल लोक है, धरती तीनों का मेरी मुट्ठी में हैं, सब कुछ मुझसे जन्म पाते है और मरकर भी मुझमें ही स्थान प्राप्त करते और तू मुझे बांधने चला है | तू स्वयं अपनी मृत्यु को बुला रहा है|
विशेषता:भगवान ने दुर्योधन को समझाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन जब अंत समय आता है तो विवेक समाप्त हो जाता है |
‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।
शब्दार्थ:जिह्वा -जीभ |कढ़ती -निकलती |दृष्टि-नजर |
व्याख्या:कृष्ण जी कहते हैं कि सारी सृष्टि मुझमें है,मेरी जीभ से आग निकलती है,वायु मेरी साँसों से बनती है, मेरी आँखों से प्रकृति फलती - फूलती है और जब मैं आँखों के खोलने और बंद करने से संसार प्रकाशवान होता है, जन्म - मृत्यु होती है और तू मुझे पकड़ने चला है , तू अपनी मृत्यु को बुला रहा है |
विशेषता: भगवान को पकड़ने वाली जंजीर आज तक नहीं बनी है |
‘बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?
शब्दार्थ:जंजीर-चैन|अनंत-असीमित |
व्याख्या: कृष्ण जी दुर्योधन से कहते है कि तू मुझे बांधने तो आया है क्या इतनी बड़ी जंजीर लाया है जितना विशाल रूप मैंने तुझे बताया है | तू अगर मुझे बांधना चाहता है तो तो पहले असीमित आसमान को बांध| आर तू क्या मुझे बांधेगा ! जो शांति का संदेश मान सका वह मुझे क्या बांधेगा | यह तेरे बस की बात नहीं है |
विशेषता: भगवान दुर्योधन को अब चुनौती दे रहे हैं |
‘हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।
शब्दार्थ:हित -भले |संकल्प-प्रतिज्ञा|याचना-प्रार्थना |
व्याख्या: कृष्ण जी कहते हैं कि तूने तेरे भले की बात नहीं मानी , तूने दोस्ती का मूल्य नहीं पहचाना , इतना समझाने के बाद भी तू अपनी जिद पर अदा है तो अब मेरी प्रतिज्ञा भी सुन कि अब कोई तुझसे प्रार्थना नहीं करेगा और अब तो युद्ध ही होगा, तेरे सामने अधिकार की बात की गई लेकिन तुझे नहीं मानना है मेरी भी बात सुन मृत्यु होगी या युद्ध में जीत इसकी मुझे चिंता नहीं है अब बस युद्ध ही होगा |
विशेषता: अगर कोई समझना नहीं चाहता तो भी उसे समझाने की पूरी कोशिश करने के बाद सबक सीखना भी पड़ता है |
‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।
शब्दार्थ:शत-सौ|कोटि -करोड़ |धनेश - कुबेर| दण्डधर-राजा|लोकपाल -रक्षक|
व्याख्या: आगे कृष्ण भगवान कहते हैं कि तू बांधना चाहता है तो दुर्योधन बढ़ा अपनी जंजीर और बांध पहले उँ सब को जो मेरे हि रूप हैं विष्णु,ब्रह्मा,महेश,जल में शयन करने वाले विष्णु,धनपती कुबेर,शिव के अवतार रुद्र , मृत्य देवता और पूरी सृष्टि के जन्मदाता ब्रह्मा जो जिनका रूप सौ करोड़ गुना विशाल हैं |
विशेषता: भगवान ने अपनी विशालता का परिचय अन्य शक्तियों के द्वारा दिया|
‘भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, इसमें कहाँ तू है।
शब्दार्थ:भूलोक -पृथ्वी लोक|अटल-आकाश |रण-युद्ध |पटी -भरी |
व्याख्या: भगवान कृष्ण दुर्योधन को चेतावनी देते हैं कि तू जो आज कर रहा है उसका आने वाले समय में परिणाम की कल्पना करके देख कि धरती,आकाश,पाताल ,बहुत और भविष्यकाल देख कि तेरी जिद्द के कारण क्या होगा , महाभारत का युद्ध होगा जिसमें पूरी धरती मरे हुए लोगों से भरी पड़ी होगी और दूसरे ही नहीं उँ मरे लोगों में कहीं तू भी होगा तू देख उनमें तू कहाँ है अर्थात तू भी मरने वाला है |
विशेषता: प्रभु की चेतावनी पारिणाम में बदल जाती है|
‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।
शब्दार्थ:निकर चमकदार|वह्नि -आग |रण-युद्ध |
व्याख्या:कृष्ण जी युद्ध का दृश्य दुर्योधन को दिखाते हैं कि युद्धभूमि में जब महारथी आपस में लड़ेंगे टो वह इस प्रकार होगा जैसे नक्षत्र आपस में टकराएंगे,धरती पार आग की वर्षा होगी जब हथियार आपस में टकराएंगे ,यह धरती जो शेषनाग के फन पर बैठी है वह भी डगमगाने लगेगी और मृत्यु का भयानक मुंह खुलेगा और दुनिया उस में समय जाएगी , ए दुर्योधन यह युद्ध एसा होगा जैसा पहले कभी नहीं हुआ होगा |
विशेषता: भयंकर परिणामों की घोषणा भगवान ने पहले ही कर दी थी|
‘भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।’
शब्दार्थ:विष - जहर |वायस -कौवे |शृंगाल-सियार,भेड़िये |भूशायी-धरती पर गिरा |
व्याख्या: युद्ध में भाई-भाई आपस में लड़ेंगे, एक दूसरे को जहर बुझे बयानों से बेदेंगे| इसमे कौवों और सियारों को भोजन मिलेगा और मनुष्यों के भाग्य फुट जाएंगे और अंत में इस युद्ध में तू भी मरेगा लेकिन इस हिंसा का उत्तरदायी भी तू ही होगा |
विशेषता: अन्याय करने वाले व्यक्ति को उसके कर्मों का फल बहुत बड़ी कीमत चुकाकर देनी पड़ता है,कई बार प्राणों से भी हाथ धोना पड़ता है |
थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित,
निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!
शब्दार्थ: सन्न -भौचक ,आश्चर्यचकित |
नर-मनुष्य |प्रमुदित - हर्षित,आनंदित, प्रसन्न|
- रामधारी सिंह 'दिनकर'
व्याख्या:भगवान की यह चेतावनी सुनकर सभा में उपसतिथ सभी लोग भौचक्के रह गए , सभी लोग युद्ध के परिणाम सुनकर के मारे चुप हो गए थे या बेहोश हो गए थे | विदुर और धृतराष्ट्र भगवान का विशाल रूप देखकर संतुष्ट नहीं हो रहे थे और वे दोनों प्रभु के रूप को आनंदित भाव से देखे जा रहे थे, हाथ जोड़कर जय - जय कर रहे थे |
विशेषता: कहा जाता है कि धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे लेकिन भगवान का विराट रूप देखने के लिए दृष्टि आई थी |
प्रश्न 1: एक शब्द या वाक्य में उत्तर लिखिए; 1 x 10=10
- वर्षों तक वनों में घूम-घूम कर कौन निखर गए हैं? पांडव
- पांडव कहाँ घूम-घूम कर निखर आए हैं? वनों
- मैत्री की राह दिखने को भगवान कहाँ आए हैं? हस्तिनापुर
- भगवान किसे मैत्री की राह दिखाने आए हैं? दुर्योधन
- सबको सुमार्ग पर लाने को कौन आए हैं? भगवान
- भगवान हस्तिनापुर किसका सन्देश लेकर आए थे? पांडव
- पांडव अपने लिए कितने गाँव मांग रहे थे? पाँच/5
- दुर्योधन किसका आशीष न ले सका? समाज
- दुर्योधन किसको बांधने चला था? हरि /कृष्णजी/भगवान
- किसने हुंकार किया? हरि/कृष्णजी/भगवान
- कृष्णजी के रूप के विस्तार से कौन डोल गए थे? दिग्गज
- कृष्ण जी का भाल कैसा है ? दीप्त
- उदयाचल किसका दीप्त भाल है? कृष्णजी/भगवान
- कृष्णजी/भगवान का वक्षस्थयल क्या है? भूमंडल
- कृष्णजी/भगवान के पैर/पग क्या हॉन? मैनाक
- कृष्णजी/भगवान ने चमकते नक्षत्रों को कहा है बताया है? मुख
- कृष्णजी/भगवान के मुख से क्या निकलता है?आग /ज्वाला
- कृष्णजी/भगवान ने क्या संकल्प लिया था? युद्ध
- युद्ध में भाई,भाई पर कैसे बाण चलाएंगे ? विष
- युद्ध में कौन सुख लेटेंगे? कौवे, सियार
- कृष्णजी/भगवान युद्ध के लिए किसे उत्तरदाई बताया? दुर्योधन
- धृतराष्ट्र-विदुर कृष्ण जी को देखाकर क्या पुकारते थे? जय - जय
- ‘कृष्ण की चेतावनी’ के रचनाकर रामधारी सिंह दिनकर हैं|
प्रश्न 4: टिप्पणी लिकहए; कोई एक 6 x 1=6
1. दुर्योधन 2. पांडव
उत्तर 4;1. दुर्योधन
यह शीर्षक पाठ्यक्रम में सम्मिलित कविता ‘कृष्ण की चेतावनी’ कवि रामधारी सिंह दिनकर हैं से लिया गया है |
दुर्योधन एक कुटिल बुद्धि राजकुमार था जिसने अपने चचेरे भाइयों पांडवों को द्रुत क्रीडा में खल से हराकर उन्हें महल से बाहर भेज दिया था और उस पर भी मनमाने नियम बना दिए थे जिनका पालन पांडवों ने इमादारी से पूरा कर के वापस आने पर भगवान कृष्ण पांडवों की तरफ से संधि संदेश लेकर गए लेकिन दुर्योधन कोई भी बात मानने को तैयार नहीं था और कहता है कि आधा राज्य तो क्या पाँच गाँव भी नहीं देंगे और शांतिदूत कृष्ण जी को बंदी बनाने को देखता है तो कृष्ण जी अपना विशाल रूप दिखाकर उसे ललकारते हैं कि अब बांध मुझे मैं भी देखूँ तू कैसे बांध लेता है | और इस पर भगवान कहते हैं कि अब मेरा निर्णय यह है अन प्रार्थना नहीं युद्ध ही होगा और उसमें भयंकर विनाश होगा और तू भी मारा जाएगा, तू ही इसका जिम्मेदार होगा |
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